बुधवार, 21 जनवरी 2026

*नरेन्द्र की उच्च अवस्था*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू मैं क्या जानूँ क्या कहूँ,*
*उस बलिये की बात ।*
*क्या जानूँ क्यों ही रहै, मो पै लख्या न जात ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र की उच्च अवस्था*
"एक दिन कमरे के दरवाजे बन्द करके उन्होंने देवेन्द्रबाबू और गिरीशबाबू से मेरे सम्बन्ध में कहा था, 'उसके घर का पता अगर उसे बता दिया जायगा, तो फिर वह देह नहीं रख सकता ।"
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मास्टर - हाँ, यह तो हमने सुना है । हम लोगों से भी यह बात उन्होंने कई बार कही है । काशीपुर में रहते हुए एक बार तुम्हारी वही अवस्था हुई थी, क्यों ?
नरेन्द्र - उस अवस्था में मुझे ऐसा जान पड़ा कि मेरे शरीर है ही नहीं; केवल मुँह देख रहा हूँ । श्रीरामकृष्ण ऊपर के कमरे में थे । मुझे नीचे यह अवस्था हुई । उस अवस्था के होते ही में रोने लगा - यह मुझे क्या हो गया ? बूढ़े गोपाल ने ऊपर आकर उनसे कहा, 'नरेन्द्र रो रहा है ।'
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"जब उनसे मेरी मुलाकात हुई तब उन्होंने कहा, 'अब तेरी समझ में आया । पर कुंजी मेरे पास रहेगी ।' मैंने कहा, 'मुझे यह क्या हुआ ?'
"दूसरे भक्तों की ओर देखकर उन्होंने कहा, 'जब वह अपने को जान लेगा, तब देह नहीं रखेगा । मैंने उसे भुला रखा है ।' एक दिन उन्होंने कहा था, 'तू अगर चाहे तो हृदय में तुझे कृष्ण दिखायी दें ।' मैंने कहा, 'मैं कृष्ण-विष्ण नहीं मानता ।'
(नरेन्द्र और मास्टर हँसते हैं)
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"एक अनुभव मुझे और हुआ है । किसी किसी स्थान पर वस्तु या मनुष्य को देखने पर ऐसा जान पड़ता है जैसे पहले मैंने उन्हें कभी देखा हो, पहचाने हुए-से दीख पड़ते हैं । अमहर्स्ट स्ट्रीट में जब मैं शरद के घर गया, शरद से मैंने कहा, उस घर का सर्वांश जैसे मैं पहचानता हूँ, ऐसा भाव पैदा हो रहा है । घर के भीतर के रास्ते, कमरे, जैसे बहुत दिनों के पहचाने हुए हैं ।
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"मैं अपनी इच्छानुसार काम करता था, वे कुछ कहते न थे । मैं साधारण ब्राह्मसमाज का मेम्बर बना था, आप जानते हैं न ?"
मास्टर - हाँ, मैं जानता हूँ ।
नरेन्द्र - वे जानते थे कि वहाँ स्त्रियाँ भी जाया करती हैं । स्त्रियों को सामने रखकर ध्यान हो नहीं सकता । इसलिए इस प्रथा की वे निन्दा किया करते थे । परन्तु मुझे वे कुछ न कहते थे । एक दिन सिर्फ इतना ही कहा कि राखाल से ये सब बातें न कहना कि तु मेम्बर बन गया है, नहीं तो फिर उसे भी जाने की इच्छा होगी ।
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मास्टर - तुम्हारा मन ज्यादा जोरदार है, इसीलिए उन्होंने तुम्हें मना नहीं किया ।
नरेन्द्र - बड़े दुःख और कष्टों के झेलने के बाद यह अवस्था हुई है । मास्टर महाशय, आपको दुःख-कष्ट नहीं मिला - मैं मानता हूँ कि बिना दुःख-कष्ट के हुए कोई ईश्वर को आत्मसमर्पण नहीं करता –
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"अच्छा, अमुक व्यक्ति कितना नम्र और निरहंकार है ! उसमें कितनी विनय है ! क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मुझमें किस तरह विनय आये ?"
मास्टर - उन्होंने तुम्हारे अहंकार के सम्बन्ध में बतलाया था कि यह किसका अहंकार है ।
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नरेन्द्र - इसका क्या अर्थ है ?
मास्टर - राधिका से एक सखी कह रही थी, 'तुझे अहंकार हो गया है, इसीलिए तूने कृष्ण का अपमान किया है ।' इसका उत्तर एक दूसरी सखी ने दिया । उसने कहा, 'हाँ, राधिका को अहंकार तो हुआ है परन्तु यह अहंकार है किसका ?' - अर्थात्, श्रीकृष्ण मेरे पति हैं - यह अहंकार है, - इस 'अहं' भाव को श्रीकृष्ण ने ही उसमें रखा है । श्रीरामकृष्ण के कहने का अर्थ यह है कि ईश्वर ने ही तुम्हारे भीतर यह अहंकार भर रखा है, अपना बहुतसा कार्य करायेंगे, इसलिए ।
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नरेन्द्र - परन्तु मेरा 'अहं' पुकारकर कहता है कि मुझे कोई क्लेश नहीं है ।
मास्टर - (सहास्य) - हाँ, तुम्हारी इच्छा की बात है ।
(दोनों हँसते हैं)
अब दूसरे दूसरे भक्तों की बात होने लगी - विजय गोस्वामी आदि की ।
नरेन्द्र - विजय गोस्वामी की बात पर उन्होंने कहा था, 'यह दरवाजा ठेल रहा है ।’
मास्टर - अर्थात् अभी तक घर के भीतर घुस नहीं सके ।
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"परन्तु श्यामपुकुरवाले घर में विजय गोस्वामी ने श्रीरामकृष्ण से कहा था, 'मैंने आपको ढाके में इसी तरह देखा था, इसी शरीर में ।' उस समय तुम भी वहाँ थे ।
नरेन्द्र - देवेन्द्रबाबू, रामबाबू ये लोग भी संसार छोड़ेंगे । बड़ी चेष्टा कर रहे हैं । रामबाबू ने छिपे तौर पर कहा है, दो साल बाद संसार छोड़ेंगे ।
मास्टर - दो साल बाद ? शायद लड़के-बच्चों का बन्दोबस्त हो जाने पर ?
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नरेन्द्र - और यह भी है कि घर भाड़े से उठा देंगे और एक छोटासा मकान खरीद लेंगे । उनकी लड़की के विवाह की व्यवस्था अन्य सम्बन्धी कर लेंगे ।
मास्टर - नित्यगोपाल की अच्छी अवस्था है - क्यों ?
नरेन्द्र- क्या अवस्था है ?
मास्टर - कितना भाव होता है ! - ईश्वर का नाम लेते ही आँसू बह चलते हैं - रोमांच होने लगता है !
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नरेन्द्र - क्या भाव होने से ही बड़ा आदमी हो गया ?
"काली, शरद, शशी, सारदा - ये सब नित्यगोपाल से बहुत बड़े आदमी हैं । इनमें कितना त्याग है ! नित्यगोपाल उनको (श्रीरामकृष्ण को) मानता कहाँ है ?"
मास्टर - उन्होंने कहा भी है कि वह यहाँ का आदमी नहीं है । परन्तु श्रीरामकृष्ण पर भक्ति तो वह खूब करता था, मैंने अपनी आँखों से देखा है ।
नरेन्द्र - क्या देखा है आपने ?
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मास्टर - जब मैं पहले-पहल दक्षिणेश्वर जाने लगा था, तब श्रीरामकृष्ण के कमरे से भक्तों का दरबार जाने पर, एक दिन बाहर आकर मैंने देखा - नित्यगोपाल घुटने टेककर बगीचे की लाल सुरखीवाली राह पर श्रीरामकृष्ण के सामने हाथ जोड़े हुए था, श्रीरामकृष्ण खड़े थे । चाँदनी बड़ी साफ थी । श्रीरामकृष्ण के कमरे के ठीक उत्तर तरफ जो बरामदा है उसी के उत्तर ओर लाल सुरखीवाला रास्ता है । उस समय वहाँ और कोई न था । जान पड़ा, नित्यगोपाल शरणागत हुआ है, और श्रीरामकृष्ण उसे आश्वासन दे रहे हैं ।
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नरेन्द्र - मैंने नहीं देखा ।
मास्टर - और बीच बीच में श्रीरामकृष्ण कहते थे, उसकी परमहंस अवस्था है । परन्तु यह भी मुझे खूब याद है, श्रीरामकृष्ण ने उसे स्त्री भक्तों के पास जाने की मनाही की थी । बहुत बार उसे सावधान कर दिया था ।
नरेन्द्र - और उन्होंने मुझसे कहा था, 'उसकी अगर परमहंस अवस्था है तो धन के पीछे क्यों भटकता है ?' और उन्होंने यह भी कहा था, 'वह यहाँ का आदमी नहीं है । जो हमारे अपने आदमी हैं, वे यहाँ सदा आते रहेंगे। ।
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"इसीलिए तो वे बाबू पर नाराज होते थे । इसलिए कि वह सदा नित्यगोपाल के साथ रहता था, और उनके पास ज्यादा आता न था ।
“मुझसे उन्होंने कहा था, 'नित्यगोपाल सिद्ध है - वह एकाएक सिद्ध हो गया है - आवश्यक तैयारी के बिना । वह यहाँ का आदमी नहीं है; अगर अपना होता तो उसे देखने के लिए मैं कुछ भी तो रोता, परन्तु उसके लिए में नहीं रोया ।'
"कोई-कोई उसे नित्यानन्द कहकर प्रचार कर रहे हैं । परन्तु उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) कितनी ही बार कहा है, 'मैं ही अद्वैत, चैतन्य और नित्यानन्द हूँ । एक ही आधार में मैं उन तीनों का समष्टि-रूप हूँ ।"
(क्रमशः)

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