बुधवार, 21 जनवरी 2026

*१७. बचन बिबेक को अंग ५/८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१७. बचन बिबेक को अंग ५/८*
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सुन्दर सुनतें होइ सुख, तब ही मुख तें बोल । 
आक बाक बकि और की, बृथा न छाती छोल ॥५॥
अतः बुद्धिमान् पुरुष को ऐसे वचन बोलने चाहियें जो सुनने वाले को सुखप्रद एवं शान्तिप्रद हों । उसे सदा ध्यान रखना चाहिये कि सुनने वाले के हृदय को उसके निरर्गल एवं निरर्थक वचनों से कोई व्यर्थ आघात(हार्दिक कष्ट = छाती छोल) न हो ॥५॥
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सुन्दर वाही वचन है, जा महिं कछू बिबेक । 
ना तरु झेरा मैं पर्यौ, बोलत मानौ भेक ॥६॥
सभ्य समाज में बैठ कर बुद्धिमान् पुरुष का ऐसा ही वचन उचित माना जाता है जो विवेकपूर्ण, हितकर, सुखप्रद एवं शान्तिप्रद हो; अन्यथा उस का वह सब कुछ बोला हुआ वैसा ही समझा जायगा जैसे कोई जल से भरे गड्ढे(झेरा) पर बैठा हुआ मैंढक बोल रहा हो ॥६॥
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सुन्दर वाही बोलिवौ, जा बोलै में ढंग । 
नातरु पशु बोलत सदा, कौंन स्वाद रस रंग ॥७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ज्ञानवान् पुरुष को सभ्य रीति एवं नीति से युक्त वचन ही बोलना चाहिये; अन्यथा उस का बोला हुआ वचन पशुओं के तुल्य ही समझा जायगा । क्या घोड़ों का हिनहिनाना, भैसों का अरड़ाना या ऊंटों का बलबलाना किसी को प्रिय लगता है ! ॥७॥
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घूघू कउवा रासिभा, ये जब बोलहिं आइ । 
सुन्दर तिनकौ बोलिबौ, काहू कौं न सुहाइ ॥८॥
उल्लू(घूघू), कौआ या गधा जब कभी हमारे समीप आकर बोलते हैं तो क्या उनकी वह शब्दध्वनि हमको कर्णप्रिय लगती है । वह किसी को भी प्रिय नहीं लगती ! ॥८॥
(क्रमशः)  

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