सोमवार, 19 जनवरी 2026

*१६. चाणक को अंग २३/२५*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग २३/२५*
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केस लुचाइ न ह्वै जती, कान फराइ न जोग । 
सुंदर सिद्धि कहा भई, बादि हंसाये लोग ॥२३॥
क्या कोई केवल शिर के बाल नोचते रहने से 'यति' कहला सकता है । या केवल कान फड़ाने से 'योगी' कहला सकता है ! इतने से कार्य से कोई सिद्धि प्राप्त नहीं होती; अपितु समाज उसका परिहास एवं अपमान हो करता है ॥२३॥
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सुंदर गये टटांबरी, बहुरि दिगम्बर होइ । 
पुनि बाघम्बर वोढि कै, बाघ भयौ घर खोइ ॥२४॥
आरम्भ में कोई पाषण्डी टाट(बोरी) ओढकर लोकदिखावे के लिये साधना का ढोंग करता था, पुनः लोक में अपनी प्रतिष्ठा बढाने हेतु यह दिगम्ब (नग्न) रहने लगा । अन्त में उसने अपने सम्मान में वृद्धि हेतु बाघम्बर पहन कर अपना भयोत्पादक रूप बना लिया । महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसा पाषण्ड कर के उसने अपना साधारण गृहस्थ जीवन भी नष्ट कर लिया ॥२४॥
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रक्त पीत स्वेतांबरी, काथ रंगै पुनि जैंन । 
सुंदर देखै भेख सब, कहूं न देख्या चैंन ॥२५॥ 
इति चाणक को अंग ॥१६॥
ऐसे पाषण्डी लोग समय समय पर लाल, पीले, श्वेत या कषाय वस्त्र पहन कर साधु वेष धारण कर पाषण्ड करते हैं, या कभी जैन बन जाते हैं । महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - हम ने ऐसे साधु बहुत से देखे हैं; परन्तु उनमें से किसी का भी जीवन हम को सुखमय नहीं दिखायी दिया ॥२५॥
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इति चाणक का अङ्ग सम्पन्न ॥१६॥
(क्रमशः) 

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