सोमवार, 19 जनवरी 2026

गेरुआ वस्त्र

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*परम गुरु सो प्राण हमारा,*
*सब सुख देवै सारा ।*
*दादू खेलै अनन्त अपारा,*
*अपारा सारा हमारा ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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शाम हो गयी । श्रीठाकुरघर में धूना देकर शशी दूसरे कमरों में भी धूना ले गये । हरएक देव-देवी के चित्र के पास प्रणाम करके बड़ी भक्ति के साथ उनका नाम ले रहे हैं । "श्रीश्रीगुरुदेवाय नमः । श्रीश्रीकालिकायै नमः । श्रीश्रीजगन्नाथ-सुभद्रा -बलरामेभ्यो नमः । श्रीश्रीषड्‌भुजाय नमः । श्रीश्रीराधावल्लभाय नमः । श्रीनित्यानन्दाय, श्रीअद्वैताय, श्रीभक्तेभ्यो नमः। श्रीगोपालाय, श्रीश्रीयशोदायै नमः। श्रीरामाय, श्रीलक्ष्मणाय, श्रीविश्वामित्राय नमः ।"
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मठ के बिल्ववृक्ष के नीचे पूजा का आयोजन हो रहा है । रात के नौ बजे का समय होगा । अभी पहली पूजा होगी, साढ़े ग्यारह बजे दूसरी। चारों पहर चार पूजाएँ होंगी। नरेन्द्र, राखाल, शरद, काली, सीतीं के गोपाल आदि मठ के सब भाई बेल के नीचे उपस्थित हो गये । भूपति और मास्टर भी आये हुए हैं । मठ के भाइयों में से एक व्यक्ति पूजा कर रहा है ।
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काली गीता-पाठ कर रहे हैं - सैन्यदर्शन, - सांख्ययोग, - कर्मयोग । पाठ के साथ ही बीच बीच में नरेन्द्र के साथ विचार चल रहा है ।
काली - मैं ही सब कुछ हूँ । सृष्टि, स्थिति और प्रलय मैं कर रहा हूँ ।
नरेन्द्र - मैं सृष्टि कहाँ कर रहा हूँ ? एक दूसरी ही शक्ति मुझसे करा रही है । ये अनेक प्रकार के कार्य - यहाँ तक कि चिन्ता भी वही करा रही है ।
मास्टर - (स्वगत) - श्रीरामकृष्ण कहते थे, 'जब तक कोई यह सोचता है कि मैं ध्यान कर रहा हूँ, तब तक वह आदिशक्ति के ही राज्य में है । शक्ति को मानना ही होगा ।'
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काली चुपचाप थोड़ी देर तक चिन्तन करते रहे । फिर कहने लगे, "जिन कार्यों की तुम चर्चा कर रहे हो, वे सब मिथ्या हैं और इतना ही नहीं, स्वयं 'चिन्तन' तक मिथ्या है । मुझे तो इन चीजों के विचार मात्र पर हँसी आती है ।"
नरेन्द्र - 'सोऽहम्' के कहने पर जिस 'मैं' का ज्ञान होता है, वह यह 'मैं' नहीं है । मन, देह, यह सब छोड़ देने पर जो कुछ रहता है, वही वह 'मैं' है ।
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गीता-पाठ हो जाने पर काली शान्ति-पाठ कर रहे हैं - 'ॐ शान्तिः ! शान्तिः ! शान्तिः !'
अब नरेन्द्र आदि सब भक्त खड़े होकर नृत्य-गीत करते हुए बिल्ववृक्ष की बार बार परिक्रमा करने लगे । बीच बीच में एक स्वर से 'शिव गुरु ! शिव गुरु !' इस मन्त्र का उच्चारण कर रहे हैं ।
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कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, रात्रि गम्भीर हो रही है । चारों ओर अन्धकार छाया हुआ है, जीव-जन्तु सब मौन हैं । गेरुआ वस्त्र पहने हुए इन आकौमारविरागी भक्तों के कण्ठ से उच्चारित 'शिव गुरु ! शिव गुरु !' की महामन्त्रध्वनि मेघ की तरह गम्भीर रव से अनन्त आकाश में गूँजकर अखण्ड सच्चिदानन्द में लीन होने लगी । पूजा समाप्त हो गयी । उषा की लाली फैलने ही वाली है । नरेन्द्र आदि भक्तों ने इस ब्राह्म मुहूर्त में गंगास्नान किया ।
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सबेरा हो गया । स्नान करके भक्तगण मठ में श्रीठाकुरमन्दिर में जाकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके 'दानवों के कमरे' में आकर एकत्र होने लगे । नरेन्द्र ने सुन्दर नया गेरुआ वस्त्र धारण किया है । वस्त्र के सौन्दर्य के साथ उनके श्रीमुख और देह से तपस्यासम्भूत अपूर्व स्वर्गीय पवित्र ज्योति एक हो रही है । वदनमण्डल तेजपूर्ण और साथ ही प्रेमरंजित हो रहा है ।
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मानो अखण्ड सच्चिदानन्द सागर के एक स्फुट अंश ने ज्ञान और भक्ति की शिक्षा देने के लिए शरीर-धारण किया हो - अवतार-लीला की सहायता के लिए । जो देख रहा है, वह फिर आँखें नहीं फेर सकता । नरेन्द्र की आयु ठीक चौबीस वर्ष की है । ठीक इसी आयु में श्रीचैतन्य ने संसार छोड़ा था ।
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भक्तों के व्रत के पारण के लिए श्रीयुत बलराम ने कल ही फल और मिष्टान्न आदि भेज दिये थे । राखाल आदि दो-एक भक्तों के साथ नरेन्द्र कमरे में खड़े हुए कुछ जलपान कर रहे हैं । दो-एक फल खाते ही आनन्दपूर्वक कह रहे हैं - "धन्य हो बलराम - तुम धन्य हो !" (सब हँसते हैं)
अब नरेन्द्र बालक की तरह हँसी कर रहे हैं । रसगुल्ला मुख में डालकर बिलकुल निःस्पन्द हो गये । नेत्र निर्निमेष हैं । एक भक्त नरेन्द्र की अवस्था देखकर हँसी में उन्हें पकड़ने चले कि कहीं वे गिर न जायँ ।
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कुछ देर बाद - तब भी रसगुल्ले को मुख में ही रखे हुए - नरेन्द्र पलकें खोलकर कह रहे हैं - "मेरी – अवस्था - अच्छी - है - !"
(सब लोग ठहाका मारकर हँसने लगे)
सब लोगों को अब मिठाई दी गयी । मास्टर यह आनन्द की हाट देख रहे हैं । भक्तगण हर्षपूर्वक जयध्वनि कर रहे हैं –
"जय श्रीगुरुमहाराज ! जय श्रीगुरुमहाराज !"
(क्रमशः)

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