सोमवार, 12 जनवरी 2026

सेठों के रामगढ गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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सेठों के रामगढ गमन ~ 
चिडावा से विदा होकर आचार्य उदयरामजी महाराज शिष्य- संत मंडल के सहित मार्ग की धार्मिक जनता को भगवद् भक्ति का उपदेश करते हुये सेठों के रामगढ के समीप आये तब अपने आने की सूचना पोद्दार भक्तों को दी । सूचना मिलने पर पोद्दार भक्त बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य उदयरामजी महाराज की अगवानी करने आये । 
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सत्यराम दंडवत आदि शिष्टाचार होने के पश्‍चात् शिष्य- संत मंडल के सहित आचार्यजी को लेकर संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार में होते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । प्रसाद बांटकर शोभा यात्रा समाप्त की । आचार्यजी की तथा सब संतों की सेवा का प्रबन्ध उचित रीति से कर दिया गया । दादूवाणी का प्रबन्ध रुप सत्संग प्रति दिन नियत समय पर होने लगा ।
पोद्दार जाति छोटे सुन्दरदास के भक्त बांसल गोती रायचन्दजी के १३ पुत्रों से ही बनी है । वे पुत्र सुन्दरदासजी के वर से ही प्राप्त हुये थे । इसका पूरा- पूरा परिचय छोटे सुन्दरदासजी के विवरण में दिया जायगा । अत: यह जाति परंपरा से ही दादूजी की भक्त रही है । इससे दादूवाणी से पोद्दार भक्त भली प्रकार परिचित थे ही और दादूवाणी पर उनकी श्रद्धा भी अपार थी । 
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इस कारण दादूवाणी का प्रवचन श्रवण से उनको अद्भुत आनन्द होता था । वे अपने परिवारों के सहित नित्य दादूवाणी का प्रवचन सुनने आते थे । वैसे वे दादूवाणी का पाठ तो अपने घरों में प्रति दिन ही करते थे किन्तु पूर्ण अनुभवी आचार्य उदयरामजी महाराज के मुख से सुनते थे तब हृदय में बोध भानु का उदय होकर उनके सब संशय नष्ट हो जाते थे । 
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आचार्य उदयरामजी महाराज अपने अनुभव और युक्ति दृष्टांतों से वाणी के गंभीर विषयों को भी बहुत ही रोचक बना देते थे जिससे सर्व साधारण भी समझ लेता था । समझ में आने पर प्रवचन प्रिय लगता ही है । रामगढ में पोद्दार भक्त आचार्य जी को संत मंडल के सहित भोजन कराने अपने अपने घरों पर सत्कार पूर्वक ले जाते थे । 
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आचार्य जी की मर्यादा अनुसार भोजन कराकर आचार्यजी की भेंट देते थे और संतों का भी यथोचित सत्कार करके मर्यादा पूर्वक आसन पर पहुंचाते थे । आचार्यजी जब तक रामगढ में रहे तब तक पोद्दार भक्त सत्संग और संत सेवा अति प्रसन्नता से करते रहे थे । फिर जब आचार्यजी रामगढ से पधारने लगे तब मर्यादा पूर्वक भेंट आदि से सत्कार करके संत मंडल के सहित आचार्यजी को सस्नेह विदा किया ।
(क्रमशः)  

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