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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. अथ चाणक१ को अंग {१ चाणक = कशा(कोरड़ा), ताजणा(चाबुक), चपेटा(थप्पड़) ।} १/४*
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छूट्यौ चाहत जगत सौं, महा अज्ञ मति मंद ।
जोई करै उपाइ कछु, सुन्दर सोई फंद ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी का उपदेश - अरे मूर्ख ! बुद्धि के हीन ! तूं इस संसार से मुक्ति(छुटकारा) तो चाहता है; परन्तु इसके लिये तूं जो भी उपाय करता है वह तेरे लिये इस संसार में फंसने का एक नया जाल ही बन जाता है ॥१॥
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योग करै जप तप करै, यज्ञ करै दे दांन ।
तीरथ ब्रत यम नेम तैं, सुन्दर ह्वै अभिमांन२ ॥२॥
(२ तुल० - सवैया ग्रन्थ, चाणक को अङ्ग, छ० ३)
कभी तूं इस मुक्ति के लिये कोई योगसाधना करता है, कभी कोई जप तप करने लगता है, कभी कोई यज्ञ या दान करने लगता है । कभी कोई तीर्थयात्रा या कोई विशेष व्रत करने लगता है, या किसी विशेष यम(निग्रह) या नियम(प्रतिज्ञापालन) के पालन में लग जाता है । परन्तु इन क्रियाओं के साथ ही तूँ इन का अभिमान करना आरम्भ कर देता है कि मैं ऐसा लोकोत्तर कर्म कर रहा हूँ ! ॥२॥
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सुन्दर ऊंचे पग किये, मन की अहं न जाइ ।
कठिन तपस्या करत है, अधो सीस लटकाइ ॥३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - रे मूर्ख ! क्या केवल ऊँचे पैर(शीर्षासन) करने से तेरे मन का यह अहङ्कार मिट पायगा कि तूँ अपना शिर नीचे की ओर कर कठोर तपस्या कर रहा है ! ॥३॥
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मेघ सहै सब सीस पर, बरिखा रितु चौमास ।
सुन्दर तन कौ कष्ट अति, मन मैं औरै आस ॥४॥
तूं समस्त वर्षा ऋतु में चार मास पर्यन्त जल बरसाते हुए मेघों के नीचे खड़ा होता है, परन्तु इस के प्रतिफल की प्राप्ति हेतु अपने मन में कोई अन्य आशा लिये बैठा रहता है ॥४॥
(क्रमशः)

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