शनिवार, 10 जनवरी 2026

*१५. मन कौ अंग ६५/६७*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ६५/६७*
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पंच सीस करि येकठे, धरै तराजू आइ । 
आठ बार जो तोलिये, तब मन पकर्या जाइ ॥६५॥
जैसे किसी वस्तु को एक मण तोलने के लिये यदि तराजू के एक पलड़े पर पांच सेर(एक धड़ी) का बाट रखा जाय और दूसरे पलड़े पर उस वस्तु का एक एक सीमित अंश आठ(८) वार रखा जाय तभी वह वस्तु एक मण मानी जाती है; इसी प्रकार कोई साधक पूर्वापेक्षया कुछ प्रबल साधना द्वारा मन पर निग्रह का प्रयास करें तो कुछ कम समय में उसे निगृहीत करने में समर्थ हो सकता है ॥६५॥
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धरै एक धड पालडै, तोलै बरियां चारि । 
थोरे में बसि होइ मन, पंडित लेहु बिचारि ॥६६॥
इसी प्रकार जैसे किसी वस्तु को चार बार में एक मण तोलने के लिये तराजू के एक पलड़े पर १० सेर(१ धड़) का बाट रख कर दूसरे पलड़े पर उस वस्तु को चार अंश में चार बार रखा जाता है; वैसे ही कोई साधक पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रबल साधना द्वारा अपने मन को निग्रह का प्रयास करे तो वह पूर्व से भी कम समय में उसे निगृहीत करने में समर्थ हो सकता है - ऐसा समझना चाहिये ॥६६॥
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एक सेर कुंजर हणै, अति गति तामहिं जोर । 
सेर गहे चालीस जिनि, मन तें बली न ओर ॥६७॥
हम देखते हैं कि जङ्गल में अकेला प्रबल पराक्रमी एक सेर(शेर) बड़े से बड़े मदोन्मत्त हाथियों को मार गिराता है, तो हमारे इस मन(मण) के पास तो चालीस सेर हैं, इस के बल के सामने उस एक सेर(शेर) के बल की क्या तुलना हो सकती है ॥६७॥
(क्रमशः) 

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