गुरुवार, 22 जनवरी 2026

*(२)नरेन्द्र की पूर्वकथा*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक ।*
*यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)नरेन्द्र की पूर्वकथा*
मठ में काली तपस्वी के कमरे में दो भक्त बैठे हैं । उनमें एक त्यागी है, एक गृही । दोनों २४-२५ साल की उम्र के हैं । दोनों में बातचीत हो रही है, इसी समय मास्टर भी आ गये । वे मठ में तीन दिन रहेंगे । आज 'गुड फ्रायडे' है, ८ अप्रैल १८८७, शुक्रवार । इस समय दिन के आठ बजे होंगे ।
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मास्टर ने आते ही ठाकुर-घर में जाकर श्रीरामकृष्ण के चित्र को प्रणाम किया । फिर नरेन्द्र और राखाल आदि भक्तों से मिलकर उसी कमरे में आकर बैठे, और उन दोनों भक्तों से प्रीति-सम्भाषण के अनन्तर उनकी बातचीत सुनने लगे । गृही भक्त की इच्छा संसार त्याग करने की है । मठ के भाई उन्हें समझा रहे हैं कि वे संसार न छोड़े ।
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त्यागी भक्त - कर्म जो कुछ हैं, कर डालो । करने से फिर सब समाप्त हो जायेंगे ।
"एक ने सुना था कि उसे नरक जाना होगा । उसने एक मित्र से पूछा कि नरक कैसा है । मित्र एक मिट्टी का ढेला लेकर नरक का नक्शा खींचने लगा । नरक का नक्शा उसने खींचा नहीं कि वह आदमी तुरन्त उस पर लोटने लगा, और बोला, 'चलो, मेरा नरक का भोग हो गया ।' "
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गृही भक्त - मुझे संसार अच्छा नहीं लगता । अहा ! तुम लोगों की कैसी सुन्दर अवस्था है !
त्यागी भक्त - तू इतना बकता क्यों है ? अगर निकलना है तो निकल आ; नहीं तो मजे से एक बार भोग कर ले ।
नौ बजने के बाद शशी ने श्रीठाकुरघर में पूजा की ।
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ग्यारह का समय हुआ । मठ के भाई क्रमशः गंगा-स्नान करके आ गये । स्नान के पश्चात् दूसरा शुद्ध वस्त्र धारण कर, हरएक संन्यासी श्रीठाकुरघर में श्रीरामकृष्ण के चित्र को प्रणाम करके ध्यान करने लगा ।
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भोग के पश्चात् मठ के भाइयों ने प्रसाद पाया । साथ में मास्टर ने भी प्रसाद पाया ।
सन्ध्या हो गयी । धूनी देने के पश्चात् आरती हुई । 'दानवों के कमरे' में राखाल, शशी, बूढ़े गोपाल और हरीश बैठे हुए हैं । मास्टर भी हैं । राखाल श्रीरामकृष्ण का भोग सावधानी से रखने के लिए कह रहे हैं ।
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राखाल - (शशी आदि से) - एक दिन मैंने उनके जलपान करने से पहले कुछ खा लिया था । उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा - 'तेरी ओर मुझसे देखा नहीं जाता । क्यों तूने ऐसा काम किया ?' - मैं रोने लगा ।
बूढ़े गोपाल - मैंने काशीपुर में उनके भोजन पर जोर से साँस छोड़ी थी, तब उन्होंने कहा, 'यह भोजन रहने दो ।'
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बरामदे में मास्टर नरेन्द्र के साथ टहल रहे हैं । दोनों में तरह तरह की बातचीत हो रही है । नरेन्द्र ने कहा, 'मैं तो कुछ भी न मानता था ।'
मास्टर – क्या ? ईश्वर के रूप ?
नरेन्द्र - वे जो कुछ कहते थे, पहले-पहल मैं बहुतसी बातें न मानता था । एक दिन उन्होंने कहा था, 'तो फिर तू आता क्यों है ।'
"मैने कहा, 'आपको देखने लिए, आपकी बातें सुनने के लिए नहीं ।' "
मास्टर - उन्होंने क्या कहा था ?
नरेन्द्र - वे बहुत प्रसन्न हुए थे ।
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दूसरे दिन शनिवार था, ९ अप्रैल १८७७ । श्रीरामकृष्ण के भोग के पश्चात् मठ के भाइयों ने भोजन किया, फिर वे जरा विश्राम करने लगे । नरेन्द्र और मास्टर, मठ से सटा हुआ पश्चिम ओर जो बगीचा है, वहीं एक पेड़ के नीचे एकान्त में बैठे हुए बातचीत कर रहे हैं । नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के सम्बन्ध में अपने अनुभव बता रहे हैं । नरेन्द्र की आयु २४ वर्ष की है और मास्टर की ३२ वर्ष की ।
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मास्टर - पहले-पहल जिस दिन उनसे तुम्हारी मुलाकात हुई थी, वह दिन तुम्हें अच्छी तरह याद है ?
नरेन्द्र - मुलाकात दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में हुई थी, उन्हीं के कमरे में । उस दिन मैंने दो गाने गाये थे ।
गाना - (भावार्थ) - ऐ मन, अपने स्थान में लौट चलो । संसार में विदेशी की तरह अकारण क्यों घूम रहे हो ? ...
गाना - (भावार्थ) - क्या मेरे दिन व्यर्थ ही बीत जायेंगे ? हे नाथ, मैं दिन-रात आशा-पथ पर आँख गड़ाये हुए हूँ ।...
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मास्टर - गाना सुनकर उन्होंने क्या कहा ?
नरेन्द्र - उन्हें भावावेश हो गया था । रामबाबू आदि और और लोगों से उन्होंने पूछा, 'यह लड़का कौन है ? अहा, कितना सुन्दर गाता है' मुझसे उन्होंने फिर आने के लिए कहा ।
मास्टर - फिर कहाँ मुलाकात हुई ?
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नरेन्द्र - फिर राजमोहन के यहाँ मुलाकात हुई थी । इसके बाद दक्षिणेश्वर में; उस समय मुझे देखकर भावावेश में मेरी स्तुति करने लगे थे । स्तुति करते हुए कहने लगे, 'नारायण ! तुम मेरे लिए शरीर धारण करके आये हो ।'
"परन्तु ये बातें किसी से कहियेगा नहीं ।"
मास्टर - और उन्होंने क्या कहा ?
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नरेंद्र - उन्होंने कहा, "तुम मेरे लिए ही शरीर धारण करके आये हो । मैंने माँ से कहा था, 'माँ, काम-कांचन का त्याग करनेवाले शुद्धात्मा भक्तों के बिना संसार में कैसे रहूँगा !' " उन्होंने फिर मुझसे कहा, "तूने रात को मुझे आकर उठाया, और कहा, 'मैं आ गया ।" परन्तु मैं यह सब कुछ नहीं जानता था, मैं तो कलकत्ते के मकान में खूब खर्राटे ले रहा था ।
मास्टर - अर्थात्, तुम एक ही समय Present(हाजिर) भी हो और Absent(गैरहाजिर) भी हो, जैसे ईश्वर साकार भी हैं और निराकार भी ।
(क्रमशः)

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