गुरुवार, 22 जनवरी 2026

*१७. बचन बिबेक को अंग ९/१२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१७. बचन बिबेक को अंग ९/१२*
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सारो सूवा कोकिला, बोलत बचन रसाल ।
सुन्दर सब कोउ कान दे, बृद्ध तरुन अरु बाल ॥९॥
इसके विपरीत, कोयल, मैना, तोता आदि पक्षी जब किसी के आसपास आकर मधुर एवं कणप्रिय बोली में बोलते हैं तो वह सभी को मनोहर लगती है । फिर भले ही कोई वृद्ध हो, युवा हो, या बच्चा हो सभी उस कोयल की ध्वनि को सुनने के लिये उत्कण्ठित रहते हैं ॥९॥
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सुन्दर कुवचन वचन मैं, राति दिवस को फेर ।
सुवचन सदा प्रकासमय, कुवचन सदा अंधेर ॥१०॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सुवचन एवं कुवचन में उतना ही अन्तर(भेद) है जितना दिन एवं रात्रि में होता है । सद्ववचन सदा प्रकाशयुक्त होता है तथा कुवचन अन्धकारयुक्त । अर्थात् किसी के द्वारा बोला हुआ सद्वचन सुनते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो दिन में सूर्य का प्रकाश फैल गया हो; परन्तु किसी के द्वारा बोला हुआ कुवचन सुनते ही, किसी भले आदमी को, ऐसा प्रतीत होने लगता है मानो उसके सामने अमावस्या की रात्रि का अन्धकार छा गया हो ॥१०॥
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सुन्दर सुवचन सुनत ही, सीतल ह्वै सब अंग ।
कुवचन कानन मैं परै, सुनत होत मन भंग ॥११॥
इन दोनों वचनों में एक अन्य भेद भी है । दूसरे द्वारा बोला गया सुवचन सुनते ही, सुनने वाले के हृदय एवं समस्त शरीर में शीतलता की लहर दौड़ने लगती है; परन्तु कुवचन सुनते ही, सुनने वाले का मन उद्वेलित(व्यग्र) हो उठता है कि इस का प्रतीकार करूँ ! ॥११॥
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सुन्दर सुवचन तक्र तें, राखै दूध जमाइ ।
कुवचन कांजी परत ही, तुरत फाटि करि जाइ ॥१२॥
इसी बात को महाराज दो उदाहरणों द्वारा समझा रहे हैं - १. सुवचन रूप तक्र(मट्ठा) का कुछ अंश यदि दूध में डाल दिया जाय तो वह दूध कुछ ही समय में जमकर अमर रस वाला दही बन जाता है । २. परन्तु उसी दूध में कांजी(राई एवं जीरा से बना अम्ल पेय) डाल दी जाय तो वह फट कर सभी के लिये निरर्थक(न पीने योग्य) हो जाता है ॥१२॥
(क्रमशः)

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