शनिवार, 24 जनवरी 2026

इतनी व्याकुलता कहाँ

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*एका एकी राम सों, कै साधु का संग ।*
*दादू अनत न जाइये, और काल का अंग ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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मास्टर - इस समय तुम मानो एक वैद्य हो । सब भार तुम्हीं पर है । मठ के भाइयों को तुम मनुष्य बनाओगे ।
नरेन्द्र - हम लोग जो साधन-भजन कर रहे हैं, यह उन्हीं की आज्ञा से । परन्तु आश्चर्य है, रामबाबू साधना की बात पर हम लोगों को ताना मारते हैं । वे कहते हैं, 'जब उनके प्रत्यक्ष दर्शन कर लिए तब साधना कैसी ?'
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मास्टर - जिसका जैसा विश्वास, वह वैसा ही करे ।
नरेन्द्र - हम लोगों को तो उन्होंने साधना करने की आज्ञा दी है ।
नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के प्यार की बातें करने लगे ।
नरेन्द्र - मेरे लिए माँ काली से उन्होंने न जाने कितनी बातें कही । जब मुझे खाने को नहीं मिल रहा था, पिताजी का देहान्त हो गया था - घरवाले बड़े कष्ट में थे, तब मेरे लिए माँ काली से उन्होंने रुपयों की प्रार्थना की थी ।
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मास्टर - यह मुझे मालूम है ।
नरेन्द्र - रुपये नहीं मिले । उन्होंने कहा, 'माँ ने कहा है, मोटा कपड़ा और रूखा-सूखा भोजन मिल सकता है - रोटी-दाल मिल सकती है ।'
"मुझे इतना प्यार तो करते थे, परन्तु जब कोई अपवित्र भाव मुझमें आता था तब उसे वे तुरन्त ताड़ जाते थे । जब मैं अन्नदा के साथ घूमता था - कभी कभी बुरे आदमियों के साथ पड़ जाता था - और तब यदि उनके पास मैं आता था तो मेरे हाथ का वे कुछ न खाते थे ।
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मुझे स्मरण है, एक बार उनका हाथ कुछ उठा था, परन्तु फिर आगे न बढ़ा । उनकी बीमारी के समय एक दिन ऐसा होने पर उनका हाथ मुँह तक गया और फिर रुक गया । उन्होंने कहा, 'अब भी तेरा समय नहीं आया ।'
"कभी-कभी मुझे बड़ा अविश्वास होता है । रामबाबू के यहाँ मुझे जान पड़ा कि कहीं कुछ नहीं है । मानो ईश्वर-फीश्वर कहीं कुछ नहीं ।"
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मास्टर - वे कहते थे कि कभी कभी उन्हें भी ऐसा ही होता था ।
दोनों चुप हैं । मास्टर कहने लगे - "तुम लोग धन्य हो ! दिन-रात उनके चिन्तन में रहते हो ।" नरेन्द्र ने कहा - "कहाँ ? हममें इतनी व्याकुलता कहाँ कि ईश्वरदर्शन न होने के दुःख से शरीर-त्याग कर सकें ?"
रात हो गयी है । निरंजन को पुरीधाम से लौटे कुछ ही समय हुआ है । उन्हें देखकर मठ के भाई और मास्टर प्रसन्न हो रहे हैं । वे पुरीयात्रा का हाल कहने लगे ।
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निरंजन की उम्र इस समय २५-२६ साल की होगी । सन्ध्या-आरती के हो जानेपर कोई ध्यान करने लगे । निरंजन के लौटने पर बहुतसे भाई बड़े घर में आकर बैठे । सत्प्रसंग होने लगा । रात के नौ बजे के बाद शशी ने श्रीरामकृष्ण को भोगार्पण करके उन्हें शयन कराया ।
मठ के भाई निरंजन को साथ लेकर भोजन करने बैठे । उस दिन भोजन में रोटियाँ थीं, एक तरकारी, जरासा गुड़ और श्रीरामकृष्ण के नैवेद्य की थोड़ीसी खीर ।
(क्रमशः)

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