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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*खंड खंड कर ब्रह्म को, पख पख लीया बाँट ।*
*दादू पूरण ब्रह्म तज, बँधे भरम की गाँठ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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फिर अमरिकनों से कह रहे हैं - "... अपनी महान् वाणी से ईसा ने जगत् में घोषणा की, 'दुनिया के लोगों, इस बात को भलीभांति जान लो कि स्वर्ग का राज्य तुम्हारे अभ्यन्तर में अवस्थित है ।' - 'मैं और मेरे पिता अभिन्न हैं ।' - साहस कर खड़े हो जाओ और घोषणा करो कि मैं केवल ईश्वर-तनय ही नहीं हूँ, पर अपने हृदय में मुझे यह भी प्रतीति हो रही है कि मैं और मेरे पिता एक और अभिन्न हैं । नाजरथवासी ईसा मसीह ने यही कहा ।...
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“.... इसलिए हमें केवल नाजरथवासी ईसा में ही ईश्वर का दर्शन न कर विश्व के उन सभी महान् आचार्यों व पैगम्बरों में भी उसका दर्शन करना चाहिए, जो ईसा के पहले जन्म ले चुके थे, जो ईसा के पश्चात् आविर्भूत हुए हैं और जो भविष्य में अवतार ग्रहण करेंगे । हमारा सम्मान और हमारी पूजा सीमाबद्ध न हों ।
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ये सब महापुरुष उसी एक अनन्त ईश्वर की विभिन्न अभिव्यक्ति हैं । वे सब शुद्ध और स्वार्थगन्ध-शून्य हैं, सभी ने इस दुर्बल मानवजाति के उद्धार के लिए प्राणपण से प्रयत्न किया है, इसी के लिए अपना जीवन निछावर कर दिया है । वे हमारे और हमारी आनेवाली सन्तान के सब पापों को ग्रहण कर उनका प्रायश्चित्त कर गये हैं ।..." - 'महापुरुषों की जीवनगाथाएँ' से उद्धृत
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स्वामीजी वेदान्त की चर्चा करने के लिए कहा करते थे, परन्तु साथ ही उस चर्चा में जो विपत्ति है, वह भी बता देते थे । श्रीरामकृष्ण जिस दिन ठनठनिया में श्री शशधर पण्डित के साथ वार्तालाप कर रहे थे, उस दिन नरेन्द्र आदि अनेक भक्त वहाँ पर उपस्थित थे, १८८४ ईसवी ।
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ज्ञानयोग व स्वामी विवेकानन्द
श्रीरामकृष्ण ने कहा है, 'ज्ञानयोग इस युग में बहुत कठिन है । जीव का एक तो अन्न में प्राण है, उस पर आयु कम है । फिर देह-बुद्धि किसी भी तरह नहीं जाती । इधर देह-बुद्धि न जाने से ब्रह्मज्ञान नहीं होता । ज्ञानी कहते हैं, 'मैं वही ब्रह्म हूँ ।' मैं शरीर नहीं हूँ, मैं भूख-प्यास, रोग-शोक, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख इन सभी से परे हूँ ।
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यदि रोग-शोक सुख-दुःख इन सब का बोध रहे तो तुम ज्ञानी क्योंकर होगे ? इधर काँटे से हाथ चुभ रहा है, खून की धारा बह रही है, बहुत दर्द हो रहा है, परन्तु कहता है, 'कहाँ, हाथ तो नहीं कटा ! मेरा क्या हुआ ?'
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"इसलिए इस युग के लिए भक्तियोग है । इसके द्वारा दूसरे पथों की तुलना में आसानी से ईश्वर के पास जाया जाता है । ज्ञानयोग या कर्मयोग तथा दूसरे पथों से भी ईश्वर के पास जाया जा सकता है, परन्तु ये सब कठिन पथ है ।" श्रीरामकृष्ण ने और भी कहा है, "कर्मियों का जितना कर्म बाकी है, उतना निष्काम भावना से करें ।
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निष्काम कर्म द्वारा चित्तशुद्धि होने पर भक्ति आयेगी । भक्ति द्वारा भगवान की प्राप्ति होती है ।" स्वामीजी ने भी कहा, "देह-बुद्धि रहते 'सोऽहम्' नहीं होता - अर्थात् सभी वासनाएँ मिट जाने पर, सर्वत्याग होने पर तब कहीं समाधि होती है । समाधि होने पर तब ब्रह्मज्ञान होता है । भक्तियोग सरल व मधुर (natural and sweet) है ।"
(क्रमशः)

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