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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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कोटा नरेश ने संत सेवा का बहुत अच्छा प्रबन्ध कर दिया । किसी भी संत को कोई आवश्यकता हो तो वह शीघ्र पूरी की जाय ऐसा आदेश जो सेवा के लिये नियत किया गया था उस मंत्री को दे दिया । किन्तु इन संतों को कुछ भी आवश्यकता नहीं होती थी । पंक्ति में भोजन पाते थे ।
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बारं बार खाना इनका नहीं होता था । जल का प्रबन्ध बिना कहे ही रहता था । भोजन में इनके सात्विक वस्तुयें ही काम में आती थीं । नगर में साधुओं के अकेले जाने पर आचार्य जी का प्रतिबन्ध था । जो भी आवश्यकता हो, वह आचार्य जी को कही जाय । ऐसी ही इनके संत मंडल की प्रथा थी ।
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फिर चातुर्मास का कार्यक्रम आरंभ हो गया । राजा प्रजा सत्संग में भाग लेने लगे । श्री दादूवाणी का प्रवचन अति मधुर होने से सबको ही प्रिय लगता था । धार्मिक जनता की नित्य नूतन रुचि बढती ही जा रही थी । दादूवाणी के प्रवचन जिज्ञासुओं के हृदयों को विकसित कर रहे थे । विचारशील व्यक्तियों के आनन्द की वृद्धि हो रही थी ।
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संतों को तो दादूवाणी का प्रवचन परम प्रिय लगता ही था । कारण दादूवाणी में राजकथा, देवकथा, भोजनकथा, शरीरकथा से रहित परम तत्त्वरुप परब्रह्म का स्वरुप व उसकी प्राप्ति के साधना का ही वर्णन है । अत: संतों की ब्रह्माकार वृति को स्थिर करने में जो सहायक विषय हैं, उन्हीं का वर्णन दादूवाणी में होने से वह संतों को अत्यन्त प्रिय लगती है ।
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उदयरामजी महाराज जैसे अनुभवी वक्ताओं के द्वारा जब दादूवाणी का प्रवचन श्रवण करने को प्राप्त हो तब तो सभी प्रकार के श्रोताओं के लिये महा आनन्द का प्रदाता सिद्ध होता ही है । अत: सत्संग की दृष्टि से कोटा का यह चातुर्मास बहुत ही अच्छा हो रहा था । संत सेवा भी बहुत अच्छी हो रही थी ।
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हजारों मानवों के हृदय पट पर परब्रह्म भक्ति का रंग इस चातुर्मास में लगा । निर्गुण भक्ति का अच्छा प्रचार हुआ । भाग्य शालिनी जनता के मुख से हर समय ईश्वर नाम सुनाई देते थे । कोटा नरेश छत्रशाल सिंह का यह उद्योग जनता में भगवद् भक्ति का संस्कार जमाने में सफल रहा ।
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चातुर्मास समाप्ति पर कोटा नरेश व वहां की धार्मिक जनता ने अपने प्रिय आचार्य उदयराम जी महाराज को मर्यादानुसार भेंट दी और संतों को वस्त्रादि देकर उचित सेवा की तथा सस्नेह विदा किया । वहां से विदा होकर आचार्य उदयराम जी महाराज मार्ग के सेवकों तथा अपने समाज के साधुओं का आतिथ्य स्वीकार करते हुये तथा यथार्थ उपदेश देते हुये नारायणा दादूधाम में पधारे ।
(क्रमशः)

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