शनिवार, 24 जनवरी 2026

*१७. बचन बिबेक को अंग १३/१६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१७. बचन बिबेक को अंग १३/१६*
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सुन्दर सुवचन कै सुनै, उपजै अति आनंद । 
कुवचन काननि मैं परै, सुनत होत दुख द्वंद ॥१३॥
इस प्रकार श्रीसुन्दरदासजी इस विषय का उपसंहार करते हुए कहते हैं – सुवचन के श्रवणमात्र से श्रोता के हृदय में अतिशय आनन्द उमड़ने लगता है; परन्तु किसी कुवचन का श्रोता के कानों से संपर्क होते ही उस का मन दुःखद्वन्द्वों से भर जाता है ॥१३॥
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सुन्दर वचन सु त्रिविध हैं, एक वचन है फूल ।
एक वचन है असम से, एक वचन है सूल ॥१४॥
त्रिविध वचन : श्रीसुन्दरदासजी के अनुसार समाज में तीन प्रकार के वचन बोले जाते हैं - १. जो बचन बोले जाने पर फूल के समान प्रतीत हो; २. जो बोले जाने पर श्रोता को पत्थर के समान ज्ञात हो; ३. एक वचन वह भी होता है जो बोले जाने पर श्रोता को सुनते ही उसके हृदय में शूल के समान आघात पहुँचाये ॥१४॥
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सुन्दर वचन सु त्रिबिध हैं, उत्तम मध्य कनिष्ट । 
एक कटुक इक चरपरै, एक वचन अति मिष्ट ॥१५॥
समाज में बोले हुए वचनों का यह त्रिविध विभाजन भी है - १. उत्तम वचन, २. मध्यम वचन, एवं ३. कनिष्ठ वचन । उन में १. सुनने में बहुत मधुर होता है; २. सुनने में चटपटा(तीखे स्वाद वाला) तथा ३. वह वचन सुनने में कर्णकटु होता है ॥१५॥
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सुन्दर जान प्रवीण अति, ताकै आगै आइ । 
मूरख वचन उचारि कैं, बांणी कहै सुनाइ ॥१६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - किसी प्रमुख पण्डित के सम्मुख आकर कोई मूर्ख अपने अनर्गल निरर्थक बचन बोलने लगे ॥१६॥
(क्रमशः) 

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