गुरुवार, 8 जनवरी 2026

'ईशदूत ईसा'

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू इस संसार में, ये द्वै रत्न अमोल ।*
*इक सांई अरु संतजन, इनका मोल न तोल ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी १८९९ ईसवी में दूसरी बार अमरीका गये थे । उस समय १९०० ईसवी में उन्होंने कैलिफोर्निया(California) प्रान्त में लास इंजिलस(Los Angeles) नामक नगर में 'ईशदूत ईसा'(Christ the Messenger) विषय पर एक भाषण दिया था । इस भाषण में उन्होंने फिर से अवतार-तत्त्व को भलीभांति समझाने की चेष्टा की थी ।
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स्वामीजी ने कहा –"... इसी महापुरुष(ईसा मसीह) ने कहा है, 'किसी भी व्यक्ति ने ईश्वर-पुत्र के माध्यम बिना ईश्वर का साक्षात्कार नहीं किया है ।' और यह कथन अक्षरशः सत्य है । ईश्वर-तनय के अतिरिक्त हम ईश्वर को और कहाँ देखेंगे ? यह सच है कि मुझमें और तुममें, हममें से निर्धन से भी निर्धन और हीन से भी हीन व्यक्ति में भी परमेश्वर विद्यमान है, उनका प्रतिबिम्ब मौजूद है ।
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प्रकाश की गति सर्वत्र है, उसका स्पन्दन सर्वव्यापी है, किन्तु हमें उसे देखने के लिए दीप जलाने की आवश्यकता होती है । जगत् का सर्वव्यापी ईश भी तब तक दृष्टिगोचर नहीं होता, जब तक ये महान् शक्तिशाली दीपक, ये ईशदूत, ये उसके सन्देशवाहक और अवतार, ये नर-नारायण उसे अपने में प्रतिबिम्बित नहीं करते ।...
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ईश्वर के इन सब महान् ज्ञानज्योतिसम्पन्न अग्रदूतों में से आप किसी एक की ही जीवन-कथा लीजिये और ईश्वर की जो उच्चतम भावना आपने हृदय में धारण की है, उससे चरित्र की तुलना कीजिये । आपको प्रतीत होगा कि इन जीवित और जाज्वल्यमान आदर्श महापुरुषों के चरित्र की अपेक्षा आपकी भावनाओं का ईश्वर अनेकांश में हीन है, ईश्वर के अवतार का चरित्र आपके कल्पित ईश्वर की अपेक्षा कहीं अधिक उच्च है ।
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आदर्श के विग्रह-स्वरूप इन महापुरुषों ने ईश्वर की साक्षात् उपलब्धि कर, अपने महान् जीवन का जो आदर्श, जो दृष्टान्त हमारे सम्मुख रखा है, ईश्वरत्व की उससे उच्च भावना धारण करना असम्भव है । इसलिए यदि कोई इनकी ईश्वर के समान अर्चना करने लगे. तो इसमें क्या अनौचित्य है ?
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इन नरनारायणों के चरणाम्बुजों में लुण्ठित हो यदि कोई उनकी भूमि पर अवतीर्ण ईश्वर के समान पूजा करने लगे तो क्या पाप है ? यदि उनका जीवन हमारे ईश्वरत्व के उच्चतम आदर्श से भी उच्च है तो उनकी पूजा करने में क्या दोष ? दोष की बात तो दूर रही, ईश्वरोपासना की केवल यही एक विधि सम्भव है ।..."
-'महापुरुषों की जीवनगाथाएँ' से उद्धृत
(क्रमशः)

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