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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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संगरुर का चातुर्मास ~
वि. सं. १९१३ में जीन्द राज्य की राजधानी संगरुर में शिष्य मंडल के सहित पधारे । उस समय आचार्य उदयरामजी महाराज के स्वागत के लिए वहां के राजा स्वरुपसिंह जी स्वयं ही राजकीय लवामजा लेकर आये । भेंट चढाकर प्रणाम की, और आवश्यक प्रश्नोत्तर के पश्चात् बाजे गाजे से भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये नगर में लाये और एकांत स्थान में ठहराया ।
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संत सेवा का प्रबन्ध उत्तम रीति से करा दिया गया । सत्संग होने लगा । आचार्य उदयरामजी महाराज का प्रवचन तो अति रोचक होता ही था । अत: आप के दादूवाणी के प्रवचन में राजा तथा प्रजागण बहुत ही आते थे । सत्संग बहुत सुन्दर होता था । चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार ही सब कार्यक्रम होते थे ।
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चातुर्मास की समाप्ति पर राजा स्वरुपसिंहजी ने चातुर्मास की भेंट में एक हाथी की कीमत तथा एक हजार रुपये भेंट चढाये । प्रजागण ने भी अपनी- अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंटें चढाई । फिर राजा प्रजा के द्वारा आदर पूर्वक संगरुर से विदा होकर शिष्य मंडल के साथ उत्तराध की रामत करने पधारे । स्थान स्थान पर सत्संग द्वारा धार्मिक जनता को निर्गुणराम की भक्ति में लगाते हुये तथा उत्तराधे संतों के स्थानों में ठहरते हुये पटियाला की ओर चले ।
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पटियाला गमन ~
पटियाला पहुँचने पर पटियाला नरेश भी विधि विधान से शिष्य मंडल के सहित आचार्य उदयरामजी महाराज का अच्छी प्रकार स्वागत करके नगर में लाये । अच्छे एकान्त स्थान में ठहराया । शिष्य मंडल के सहित आचार्यजी को बहुत प्रेम से रसोई दी । आचार्यजी को जिमाकर मर्यादानुसार भेंट दी ।
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संत मंडल का भी उचित रुप से सत्कार किया और सत्संग किया । इच्छानुसार शास्त्र चर्चा सुनी । अपनी शंकाओं के समाधान आचार्यजी के द्वारा हो जाने से राजा को अति प्रसन्नता हुई । पटियाला के स्थानधारी उत्तराधे संतों ने भी रसोई दी व मर्यादानुसार भेंट दी । संत मंडल का भी सत्कार किया ।
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आचार्य उदयरामजी महाराज जब तक पटियाला में विराजे तब तक धार्मिक जनता ने आपका प्रवचन बहुत ही रुचि से सुना । श्रद्धा भक्ति से भक्त लोग रसोइयां देते रहे । मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट, संतों की सेवा भी यथा योग्य वस्त्रादि से करते रहे । इस समय पटियाला में अच्छा सत्संग चला ।
(क्रमशः)

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