शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

*१५. मन कौ अंग ६१/६४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ६१/६४*
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आधे पग हैं तीन सै, और अधिक पुनि बीस । 
तिनहूं तें आधे करै, षट सत अरु चालीस ॥६१॥
इस से भी आगे गणना करें तो उस मण में आधा पाव ३२० हो जायेंगें, तथा उस आधा पाव को भी विभक्त किया जाय तो उस मण में ६४० छटाँक(एक आना) हो जाते हैं ॥६१॥
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डेढ हजार रु एक सौ, इतने होंहिं अंगुष्ठ । 
चौसठि सै अंगुली करै, मन तैं कौंन सपुष्ट ॥६२॥
इस से भी आगे गणना करें तो(उस छटाँक को भी अङ्गुष्ठ माप में विभक्त कर दिया जाय तो) उसमें १६ सौ छदाम हो जायेंगे । तथा उस को भी अङ्गुली माप से विभक्त कर दिया जाय तो एक मण में ६४ सौ अङ्गुली का भार माना जायगा । यही स्थिति हमारे मन की भी मान ली जाय तो इस मन से अधिक पुष्ट कौन हो सकता है ॥६२॥
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नख की गिनती कौ गिनै, तन कै रोम अनंत । 
ऐसे मन कौं बसि करै, सुन्दर सौ बलिवंत ॥६३॥
नखों के माध्यम से मन की गणनां दुष्कर है । तथा शरीर के रोगों के माध्यम से उसकी गणना करना तो और अधिक असम्भव प्रतीत होता है; क्योंकि शरीर में अनन्त रोम हैं; अतः उनकी गणना करने का कौन साहस करे ! हम तो इतना ही कहते हैं कि जो साधक ऐसे मन का निग्रह कर सके उस को ही बलवान(समर्थ) साधक मानना चाहिये ॥६३॥
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एक पालडे सीस धरि, तोलै ताके साथ । 
बर चालीस क तौलिये, तब मन आवै हाथ ॥६४॥
जैसे किसी वस्तु को एक मण तोलने के लिये तराजू के एक पलड़े पर एक सेर का बाट रख कर दूसरे पलड़े पर उस वस्तु के कुछ भाग को चालीस(४०) बार रखते हुए तोला जाय तभी वह एक मण भार की मानी जाती है; वैसे कोई साधक जब साधना द्वारा अपने मन का बार बार निग्रह करे तभी उस का निगृहीत होना सम्भव है ॥६४॥
(क्रमशः) 

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