मंगलवार, 6 जनवरी 2026

ब्रह्मलीन होना ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
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कुछ भूमि प्राप्त ~ 
इन्हीं दिनों में खेतडी राज्य की ओर से दलेलपुरा ग्राम की दो कोटियों का पट्टा दादूद्वारे के नाम होकर नारायणा दादूधाम के आचार्य नारायणदासजी महाराज के पास आया । वि. सं. १९१२ में किशनगढ राज्य से भी भूमि का पट्टा आया । इस वर्ष आचार्य नारायणदासजी महाराज का चातुर्मास भंडारी सांवतरामजी के नियत हुआ था । वह चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार अच्छी प्रकार संपन्न हुआ । 
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ब्रह्मलीन होना ~ 
उक्त प्रकार आचार्य नारायणदासजी महाराज ने लोक कल्याण के लिये भ्रमण में धर्मोपदेश देते हुये गद्दी पर ११ वर्ष ४ मास २३ दिन विराज कर कार्तिक कृष्णा १३ बुधवार वि. सं. १९१२ में ब्रह्मलीन हुये । कहा भी है -
सम्मत शत उन्नीस का, बारह कार्तिक मास ।
कृष्ण पक्ष तेरस दिना, गये राम के पास ॥
(दादू चरित्र चन्द्रिका)
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गुण गाथा
दोहा- दादूधाम आचार्य वर, हुये नरायणदास ।
रत्त रहे निज रुप में, त्याग जगत की आश ॥१॥
राजा रावल आदि ने, धरे चरण में शीश ।
नम्र रहे तो भी सदा, सुमिरत श्री जगदीश ॥२॥
निज समाज अरु अन्य को, दीन्हा ज्ञान प्रकाश ।  
सर्व प्रिय इससे रहे, महन्त नरायण दास ॥३॥
ग्राम भूमि दी नृपों ने, श्रद्धा करके आप ।  
तदपि राग से रहित रहे, मिटा द्वन्द्व की ताप ॥४॥
नारायण आचार्य में, रही संत जन प्रीति । 
क्योंकि सदा उनमें रही, समता पूरण नीति ॥५॥ 
सेवक श्रद्धा के रहे, पात्र नरायणदास ।  
इससे सेवक उन्हों के, आते थे बहु पास ॥६॥
नारायण के चित्त की, नारायण से प्रीति ।
‘नारायण’ अद्भुत रही, कही न जात वह रीति ॥७॥ 
नारायण आचार्य को, ‘नारायण’ नति नित्य ।  
क्योंकि असत को त्यागकर, प्राप्त किया था सत्य ॥८॥
नारायण आचार्य का, नारायण से नेह ।  
मिले इसीसे ब्रह्म में, त्याग अनात्मा देह ॥९॥ 
इति श्री दशम अध्याय समाप्त: १० 
(क्रमशः) 

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