मंगलवार, 6 जनवरी 2026

*१५. मन कौ अंग ४९/५२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१५. मन कौ अंग ४९/५२*
.
देह रूप मन ह्वै रह्यौ, कियौ देह अभिमान । 
सुन्दर समुझै आपकौं, आपु होइ भगवान ॥४९॥
जब हमारा यह मन स्व देह का निरन्तर चिन्तन करता है तो यह देहाभिमानी(देह ही सब कुछ है- इस मत का पोषक) हो जाता है । परन्तु जब यह स्व स्वरूप का यथार्थ समझ लेता है तो इसे भगवत्स्वरूप होने में कुछ भी विलम्ब नहीं लगता ॥४९॥
.
जब मन देखै जगत कौं, जगत रूप ह्वै जाइ । 
सुन्दर देखै ब्रह्म कौं, तब मन ब्रह्म समाइ ॥५०॥
जब यह जगत(पति पत्नी, पुत्र आदि में) व्यामोह कर लेता है तो यह जगद्रूप हो जाता है, तथा जब यही मन उस निरञ्जन निराकार का निरन्तर चिन्तन करने लगता है तो यह तन्मय हो जाता है ॥५०॥
.
मन ही कौ भ्रम जगत सब, रज्जु मांहिं ज्यौं साप । 
सुन्दर रूपौ सीप मैं, मृग तृष्णा मंहिं आप ॥५१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह समस्त संसार मन का एकान्ततः भ्रममात्र(कल्पनासुष्टि) है; जैसे कि अन्धकार में रज्जु को भी सर्प समझ लिया जाता है । या शुक्ति(सीपी) में रजत का भ्रम हो जाता है । या मरुभूमि में, चमक के कारण मृगतृष्णा(जल का भ्रम) दिखायी देने लगती है । ऐसा ही भ्रम इस देहाभिमानी मन का समझना चाहिये ॥५१॥
.
जगत बिझूका देखि करि, मन मृग मानै संक । 
सुन्दर कियौ बिचार जब, मिथ्या पुरुष करङ्क ॥५२॥
जैसे कोई किसान, मृगों से अपने खेत की रक्षा के लिये, मानव के आकार की कोई भयोत्पादक वस्तु(= बिझुका) खड़ी कर देता है तो उस से मृग डर उस खेत को हानि नहीं पहुँचाते; या अन्धकार में किसी स्थाणु(सूखे वृक्ष का ठूंठ) को देखकर उसे नरकङ्काल समझता हुआ कोई मनुष्य भय माने; वही भ्रमात्मक स्थिति संसार के विषय में हमारे मन की है ॥५२॥
(क्रमशः) 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें