🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*तिल तिल हौं तो तारी वाटड़ी जोऊँ ।*
*एने रे आँसूड़े वाहला, मुखड़ो धोऊँ ॥२॥*
*ताहरी दया करि घर आवे रे वाहला ।*
*दादू तो ताहरो छे रे, मा कर टाला ॥३॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
परिच्छेद २, वराहनगर मठ
(१)नरेन्द्रादि भक्तों की साधना । नरेन्द्र की पूर्वकथा
.
आज शुक्रवार है, २५ मार्च, १८८७ ई.। मास्टर मठ के भाइयों को देखने के लिए आये हैं । साथ देवेन्द्र भी हैं । मास्टर प्रायः आया करते हैं और कभी कभी रह भी जाते हैं । गत शनिवार को वे आये थे, शनि, रवि और सोम, तीन दिन रहे थे । मठ के भाइयों में, खासकर नरेन्द्र में, इस समय तीव्र वैराग्य है ।
.
इसीलिए मास्टर उत्सुकतापूर्वक उन्हें देखने के लिए आते हैं । रात हो गयी है । आज रात को मास्टर मठ में ही रहेंगे ।
सन्ध्या हो जाने पर शशी ने ईश्वर के मधुर नाम का उच्चारण करते हुए ठाकुरघर में दीपक जलाया और धूप-धूना सुलगाने लगे । धूपदान लेकर कमरे में जितने चित्र हैं, सब के पास गये और प्रणाम किया ।
.
फिर आरती होने लगी । आरती वे ही कर रहे हैं । मठ के सब भाई, मास्टर तथा देवेन्द्र, सब लोग हाथ जोड़कर आरती देख रहे हैं, साथ ही साथ आरती गा रहे है - "जय शिव ओंकार, भज शिव ओंकार ! ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ! हर हर हर महादेव !"
नरेन्द्र और मास्टर बातचीत कर रहे हैं । नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के पास जाने के समय की बहुतसी बातें कह रहे हैं । नरेन्द्र की उम्र इस समय २४ साल २ महीने की होगी ।
.
नरेन्द्र - पहले-पहल जब मैं गया, तब एक दिन भावावेश में उन्होंने कहा, 'तू आया है !'
"मैंने सोचा, यह कैसा आश्चर्य है ! ये मानो मुझे बहुत दिनों से पहचानते हैं । फिर उन्होंने कहा, 'क्या तू कोई ज्योति देखता है ?'
"मैंने कहा, 'जी हाँ । सोने से पहले, दोनों भौहों के बीच की जगह के ठीक सामने एक ज्योति घूमती रहती है ।' "
.
मास्टर - क्या अब भी देखते हो ?
नरेन्द्र - पहले बहुत देखा करता था । यदु मल्लिक के भोजनागार में मुझे छूकर न जाने उन्होंने मन ही मन क्या कहा, मैं अचेत हो गया था । उसी नशे में मैं एक महीने तक रहा था ।
"मेरे विवाह की बात सुनकर माँ काली के पैर पकड़कर वे रोये थे । रोते हुए कहा था, 'माँ, वह सब फेर दे - माँ, नरेन्द्र कहीं डूब न जाय !'
.
"जब पिताजी का देहान्त हो गया, और माँ और भाइयों को भोजन तक की कठिनाई हो गयी तब मैं एक दिन अन्नदा गुहा के साथ उनके पास गया था ।
"उन्होंने अन्नदा गुहा से कहा, 'नरेन्द्र के पिताजी का देहान्त हो गया है, घरवालों को बड़ा कष्ट हो रहा है, इस समय अगर इष्टमित्र उसकी सहायता करें तो बड़ा अच्छा हो ।'
.
"अन्नदा गुहा के चले जाने पर मैं उनसे कुछ रुष्टता से कहने लगा, 'क्यों आपने उनसे ये बातें कही ?' यह सुनकर वे रोने लगे थे । कहा, 'अरे ! तेरे लिए मैं द्वार-द्वार भीख भी माँग सकता हूँ !'
.
"उन्होंने प्यार करके हम लोगों को वशीभूत कर लिया था । आप क्या कहते हैं ?"
मास्टर - इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । उनके स्नेह का कोई कारण नहीं था ।
नरेन्द्र - मुझसे एक दिन अकेले में उन्होंने एक बात कही । उस समय और कोई न था । यह बात आप और किसी से न कहियेगा ।
.
मास्टर – नहीं । हाँ, क्या कहा था ?
नरेन्द्र - उन्होंने कहा, 'सिद्धियों के प्रयोग करने का अधिकार मैंने तो छोड़ दिया है, परन्तु तेरे भीतर से उनका प्रयोग करूँगा - क्यों, तेरा क्या कहना है ?' मैंने कहा, 'नहीं, ऐसा तो न होगा ।'
"उनकी बात मैं उड़ा देता था । आपने उनसे सुना होगा । वे ईश्वर के रूपों के दर्शन करते थे, इस बात पर मैंने कहा था, 'यह सब मन की भूल है ।'
.
"उन्होंने कहा, 'अरे मैं कोठी पर चढ़कर जोर जोर से पुकारकर कहा करता था - अरे, कहाँ है कौन भक्त, चले आओ, तुम्हें न देखकर मेरे प्राण निकल रहे हैं । माँ ने कहा था, - 'अब भक्त आयेंगे,' अब देख, सब बातें मिल रही हैं ।'
"तब मैं और क्या कहता, चुप हो रहा ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें