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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१७. अथ बचन बिबेक को अंग १/४*
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सुंदर तबही बोलिये, समझि हिये मैं पैठि ।
कहिये बात बिबेक की, नहिंतर चुप ह्वै बैठि ॥१॥
विवेकपूर्ण वचन : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - वक्ता को कोई भी बात मुख से बोलने से पूर्व उस पर अपने हृदय में विचार कर लेना चाहिये । यदि वह बात विवेकपूर्ण(हितकारी) हो तो उसे बोलना चाहिये, अन्यथा चुप रहना चाहिये ॥१॥
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सुन्दर मौंन गहे रहै, जानि सकै नहिं कोइ ।
बिन बोलै गुरुवा कहैं, बोलै हरवा होइ ॥२॥
ऐसा पुरुष जब तक मौन रहेगा तब तक अन्य लोग कुछ भी न जान सकेंगे कि वह क्या कहना चाहता है । जब तक वह नहीं बोलेगा तभी तक सामने वाले के सम्मुख उसकी गम्भीरता(गुरुता) बनी रहेगी; बोल देने पर, यदि वह उसकी बोली हुई बात अविवेकपूर्ण हुई तो उसमें हल्कापन आ जायगा अर्थात् उसकी वह बात महत्त्वहीन हो जायगी ॥२॥
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सुन्दर मौंन गहे रहै, तब लगि भारी तोल ।
मुख बोलैं तें होत है, सब काहू कौ मोल ॥३॥
बुद्धिमान् पुरुष जब तक मौन रहता है तब तक समाज में उस की प्रतिष्ठा(गम्भीरता) बनी रहती है । मुख से कुछ बोलने के साथ ही समाज उसकी बुद्धिमत्ता, विद्वत्ता या महत्त्व परख लेता है ॥३॥
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सुन्दर यौं ही बकि उठै, बोलै नहीं बिचारि ।
सबही कौं लागै बुरौ, देत ढीम सौ डारि ॥४॥
यदि कोई पुरुष समाज में बैठ कर असम्बद्ध, निरर्थक या अविवेकपूर्ण वचन बोलता है, विचारपूर्वक नहीं बोलता है तो ऐसा पुरुष वहाँ उपस्थित सभी लोगों की दृष्टि में अपना महत्त्व(गरिमा) खो देता है । उस समय वहाँ बैठे हुए लोगों को उसके बोले हुए वे वचन ऐसे ही लगते हैं जैसे कोई किसी पर ढेला(= ढीम) फेंक रहा हो ॥४॥
(क्रमशः)

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