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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ५७/६०*
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इत उत कहूं न चलि सकै, थकित भया तिहिं ठौर ।
सुन्दर जैसैं नाद बसि, मन मृग बिसर्या और ॥५७॥
जैसे वीणा के नाद में मुग्ध कोई मृग अचल(स्थिर) होकर नाद श्रवण करता है कहीं इधर उधर नहीं जाता; वैसे ही प्रभुचरणों का अनुरागी मन भी तब किसी अन्य सांसारिक वासना में लिप्त होने की स्थिति में नहीं रहता ॥५७॥
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(मन शब्द को श्लेष)
धड तौ जाकै चारि हैं, द्वै द्वै सिर है बीस ।
ऐसी बडी बलाइ मन, सिर करि ले चालीस ॥५८॥
[अब यहाँ महाकवि श्लेषालङ्कार से मन की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं -]
(आगे की साषियों में 'धड़१', 'सिर२', 'द्वै सिर३', 'अध सिर४', 'पाव५', 'मन६' तथा 'सेर७' शब्द दो अर्थ वाले हैं । यथाप्रसङ्ग इन शब्दों के माध्यम से श्रीसुन्दरदासजी महाराज मन की अनन्तता का वर्णन कर रहे हैं-)
(धड़१ – १. शरीर में ग्रीवा से नीचे का भाग; २. वस्तु के तोल का पाँच सेर या दश सेर का माप । ग्रन्थकार के समय, सम्भवतः यह शब्द 'दश सेर' के अर्थ प्रयुक्त होता था । आज कल इस के स्थान पर 'धड़ी'(पांच सेर) शब्द का भी प्रयोग होता है ।)
(सिर२ – १. शिर = शरीर का ग्रीवा तक ऊपरी भाग, २. सेर = वस्तु के तोल का एक माप, जो १६ टांक के बराबर माना जाता है ।)
(द्वै सिर३ – १. दो शिर; २. दुसेरा या दुसेरी, जो दो सेर माप के बराबर माना जाता है ।)
(अध सिर४ = १. अर्ध शिर{शरीर में ग्रीवा तक आधा भाग}; २. आधा सेर [एक सेर का आधा भाग = ८ छटांक])
(पाव५ = १. पैर(चरण या पाद); २. किसी वस्तु के तोल में प्रयुक्त होने वाला एक माप {एक सेर का चतुर्थ भाग = चार छटांक})
(मन६ = १. मानव शरीर में ११ वीं इन्द्रिय; २. किसी वस्तु के तोल में प्रयुक्त होने वाला एक माप{-४० सेर} । इसे राजस्थानी भाषा में 'मण' भी कहते हैं ।)
(सेर७ = १. सिंह{जङ्गल का हिंसक पशु}; २. किसी वस्तु के तोल का एक माप{= १६ छटांक})
जैसे एक मण(वस्तुमापक बाट) में चार धड(१० सेर) तथा २० दुसेरा होते हैं तो वह ४० सेर(शिर) का हो जाता है वैसे ही यह हमारा मन भी किसी भूत प्रेत के समान इतना सामर्थ्य वाला है कि यह जब चाहे तब अपने चालीस रूप बना कर अपनी इच्छा से बाह्य संसार में विचरण करने हेतु निकल जाता है ॥५८॥
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सिर तैं द्वै अध सिर करै, सिर सिर चहुं चहुं पाव ।
ऐसैं सिर चालीस हैं, मन कहिये क छलाव ॥५९॥
उस वस्तुमापक तोल मण के प्रत्येक सेर में दो अधसेर होते हैं । तथा प्रत्येक सेर में चार अंश करें तो वे 'चार पाव' कहलाते हैं । इस प्रकार जब हमारे इस मन के भी चालीस सिर हैं तो इसे(मनुष्य का) मन कहें कि कोई छलावा(श्मशान में जब तब दिखायी देने वाली चमक; भूत प्रेत) ! ॥५९॥
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सिर जाकै चालीस हैं, असी अरध सिर जाहि ।
पांव एक सौ साठि हैं, क्यौं करि पकरै ताहि ॥६०॥
जैसे उस माप(मण) में चालीस सेर(सिर) होते हैं और अस्सी आधा सेर, तथा १६० पाव(सेर का चतुर्थ अंश) होते हैं; वैसा ही हमारा यह मन भी है । अतः ऐसे बलवान् को निगृहीत करने की सामर्थ्य किसमें है ! ॥६०॥
(क्रमशः)

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