🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१६. चाणक को अंग १३/१६*
.
एक लेत हैं ठौर ही, सुन्दर बैठि अहार ।
दाख छुहारी राइता, भोजन बिबिध प्रकार ॥१३॥
कोई साधक एक स्थान पर बैठने का अभिनय करते हुए वहीं सदा भोजन करने का नियम कर लेते हैं । वे वहाँ बैठे ही बैठे नित्य नये प्रकार का भोजन ग्रहण करते हुए दाख, छुहारा मिला हुआ रायता(दही से बना खट्टा, मीठा भोज्य पदार्थ) खाते पीते रहते हैं ॥१३॥
.
कोउक आचारी भये, पाक करै मुख मूंदि ।
सुन्दर या हुन्नर बिना, खाइ सकै नहिं खूंदि ॥१४॥
कुछ साधक ऐसे आचारवान् बन जाते हैं कि वे मुख मूंद(पट्टी बांध) कर भोजन बनाते हैं; क्योंकि वे इस अभिनय के बिना नित्य नये नये ताजा भोज्य पदार्थ नहीं पा सकते ॥१४॥
.
कोउक माया देत है, तेरै भरै भंडार ।
सुन्दर आप कलाप करि, निठि निठि जुरै अहार ॥१५॥
कोई साधक अपने धनी शिष्यों को यही आशीर्वाद देते रहते हैं कि तुम्हारे भण्डार धन से भरे रहें; जब कि वे स्वयं प्रतिदिन उनका सविनय आदर करते हुए उनसे कुछ न कुछ मांगते रहते हैं ॥१५॥
.
कोउक दूध रु पूत दे, कर पर मेल्हि बिभूति ।
सुन्दर ये पाषंड किय, क्यौं ही परै न सूति ॥१६॥
कोई पाषण्डी साधु अपने शिष्यों को "दूधों नहाओ, पूतों फलो" का आशीर्वाद देते हुए उन को विभूति(भस्म) का प्रसाद देते हैं । इतना पाषण्ड करने पर भी उन में से कुछ का जीवननिर्वाह सफलतापूर्वक नहीं हो पाता ॥१६॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें