बुधवार, 28 जनवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~११३/११६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~११३/११६*
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*ब्यालों माँहिं बालक बाँधे, विद्या के बल बादि१ ।*
*गुरु प्रसाद रहै इन्द्रियों में, पाया मंत्र युगादि ॥११३॥*
जैसे सँपेरा१ सर्प कीलने विध्या के बल से अपने बालक को सर्पों के बीच बाँध देता है, वह बालक डरता नहीं, वैसे ही गुरु के कृपा-प्रसाद से युगादि परमेश्वर का नाम रूप मंत्र वा ज्ञान रूप मंत्र गुरुदेव के शब्द द्वारा प्राप्त किया है, उसी के बल से इन्द्रियों के विषयों में रहने पर भी डरता नहीं ।
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*मन मनसा१ इन्द्रिय गुण माँखी, हरि सुमिरण हरताल ।*
*गुरु की दया दिनाई२ पाई, दुख दायों का काल ॥११४॥*
११४ में गुरु की दया की विशेषता बता रहे हैं - मन की मलीनता, चपलता, बुध्दि१ की विपरीतता, विभिन्नता, इन्द्रियों के दोष रूप गुण ये सभी मक्खी के समान हैं । हरि स्मरण हरताल के समान है, जैसे हरताल पर मक्खी नहीं बैठती वैसे ही हरि स्मरण करने से उक्त सभी की हानिकारक शक्ति नष्ट हो जाती है । शिष्य पर गुरुदेव की ज्ञान प्रदान रूप दया है वही उक्त सभी संसारिक दुख देने वालों की विनाशक२ है ।
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*अहि इन्द्रिय के गिलन को, गरुड़ सुगुरु उर आनि ।*
*मारुत भख ऐसे मरे, जन रज्जब पहिचानी ॥११५॥*
११५ से १२१ में गुरु की विशेषता पूर्वक गुरु ज्ञान ग्रहण करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जैसे सर्प को खाने के लिये गरुड़ समर्थ है, सर्प को गरुड़ के द्वारा मराया जाय तो वह सहज ही मारा जाता है, वैसे इन्द्रियों को वश में करने के लिये गुरु समर्थ हैं उनका ज्ञान हृदय में धारण करोगे तो, इस युक्ति से इन्द्रियाँ सहज ही अधीन हो जायँगी यह यथार्थ ही जानो ।
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*पंच तिणे गुरु मुख छये, माया मेघ डर नाँहिं ।*
*जन रज्जब सो जल इसा, निकसे परवत माँहिं ॥११६॥*
जैसे मुंजा की पत्तियों से अच्छी प्रकार छप्पर बना दिया जाय तो बादल से वर्षने वाला जल का डर नहीं रहता, नहीं तो जल ऐसा है कि पर्वत से भी निकल जाता है । वैसे ही पाँचो इन्द्रियें यदि गुरु-मुख से सुने ज्ञान द्वारा परमात्मा के स्वरूप में ही लग जावें तो माया के द्वारा पतन का भय नहीं रहता, नहीं तो माया ऐसी है कि बड़े बड़े तपस्वियों को भी मोहित करके परमार्थ से गिरा देती है ।
(क्रमशः)

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