बुधवार, 28 जनवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१०९/११२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१०९/११२*
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*शिष्य सदा सुस्थिर रहैं, सुन सद्गुरु की सीख ।*
*रज्जब विषय विकार दिशि, कबहूँ भरहि न बीख१ ॥१०९॥*
सद्गुरु का सत्योपदेश सुन कर शिष्य का मन परमात्मा के स्वरूप में सदा स्थिर रहता है विषय-विकारों की ओर कभी एक पैर१ भी नहीं रखता ।
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*जन रज्जब गुरु बैन सुन, बिलय होत बपु बीज ।*
*यथा हाक हनुमंत की, सुनत होत नर हीज ॥ ११०॥*
(११०- ११३ में गुरु-वचन की विशेषता बता रहे हैं) - जैसे सिंहल द्वीप में हनुमान जी की आवाज जो नर सुन लेता है, वह हिजड़ा हो जाता है वैसे ही गुरु के वचनों को श्रवण करने पर श्रोता के शरीर में ही बिंदु लय हो जाता है ।
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*मन अहि लहै न माग, रोक्या मोर महंत मुनि ।*
*रज्जब रहि गये पाग, फनि श्रवननि सुन नाद ध्वनि ॥१११॥*
जैसे मोर मार्ग रोक लेता है तब सर्प उस मार्ग में आगे नहीं बढ़ पाता, मोर की आवाज सुनकर सर्प के पैर रुक जाते हैं । वैसे ही सद्गुरु रूप महन्तमुनि अपने शिष्यों के मन का विषय-मार्ग रोक लेते हैं, गुरु की ज्ञानोपदेश ध्वनि सुन कर मन के विषयाकार वृत्ति रूप पैर रुक जाते हैं ।
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*रज्जब रहै कपूर मन, मिरच सु शब्दों माँहिं ।*
*नातरु१ डाबी डील में, ढूंढ्या लहिये नाँहिं ॥११२॥*
जैसे कपूर काली मिरचों के साथ तो डिब्बी में ठहरता है, नहीं१ तो नहीं ठहरता, वैसे ही मन सद्गुरु शब्दों के साथ रहने से तो शरीर में रहता है, नहीं तो भाग जाता है, खोजने पर भी नहीं मिलता ।
(क्रमशः)

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