गुरुवार, 29 जनवरी 2026

१८. सूरातन कौ अंग ५/८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग ५/८*
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घर मैं सब कोइ बंकुडा, मारहिं गाल अनेक । 
सुन्दर रण मैं ठाहरै, सूर बीर कौ एक ॥५॥
महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - घर में तो प्रत्येक मनुष्य स्वयं को रणवांकुरा(रणवीर) मानता हुआ अपनी वीरता की कपोलकल्पित कहानियाँ सुनाता रहता है; परन्तु सच्चा वीर तो हजारों में एक वहीं होता है जो किसी भयङ्कर युद्ध में आदि से अन्त तक ठहरकर वीरतापूर्वक युद्ध में संलग्न रहे ॥५॥
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सुन्दर सूरातन बिना, बात कहै मुख कोरि । 
सूरातन तब जाणिये, जाइ देत दल मोरि ॥६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - कोई अपने शौर्य प्रदर्शन के विना केवल मुख से उस विषय में बड़ा चढ़ा कर हजार बातें कहता रहे तो उससे दूसरों को कोई हानि लाभ नहीं होगा । लोग उस की वास्तविक शूरता तो तभी मानेंगे जब वह किसी युद्ध में पहुँचते ही शत्रुओं को नष्ट करना आरम्भ कर दे ॥६॥
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सुन्दर सूरातन कठिन, यह नहिं हांसी खेल । 
कमधज कोई रुपि रहै, जबहिं होत मुख मेल ॥७॥
संसार में किसी का शूरवीर होना बहुत दुष्कर कर्म है, कोई हंसी-खेल नहीं है । अैसा कोई ही वीर होता है जो शत्रुसेना का सामना होते ही अपने शिर काटकर उसे हथेली पर रख कर(कमधज = कबन्धज बन कर) उस प्रबल सेना पर टूट पड़े ॥७॥
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सुन्दर सूरातन किये, जगत मांहिं जस होइ । 
सीस समर्पै स्याम कौं, संक न आनै कोइ ॥८॥
जो पुरुष अपनी ऐसी वीरता दिखाता है उसी का लोक में यश फैलता है । जो अपना सिर धड़ से पृथक होने की शङ्का न कर के भी शत्रु से युद्ध करता रहे - वही सच्चा वीर है ॥८॥
(क्रमशः)

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