शनिवार, 24 जनवरी 2026

*१७. बचन बिबेक को अंग १७/१९*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१७. बचन बिबेक को अंग १७/१९*
.
सुन्दर घर ताजी बंधे, तुरकिन की घुरसाल । 
ताके आगै आइ के, टटुवा फेरै बाल ॥१७॥
तो यह उस की ऐसी ही मूर्खता कहलायगी जैसे किसी रईस के सम्मुख, जिसकी अश्वशाला में सैकड़ों तुर्की घोड़े बंधे हो, जा कर कोई मूर्ख अपना ऐश्वर्य प्रदर्शित करने हेतु कोई दुर्बल टट्टू(घोड़ा) इधर उधर घुमाने लगे ॥१७॥
.
सुन्दर जाकै बाफता, षासा मलमल ढेर । 
ताकै आगै चौसई, आनि धरै बहुतेर ॥१८॥
या किसी ऐसे धनपति के सम्मुख जाकर, जिस के घर में ऊनी, रेशमी एवं मलमल के हजारों गज वस्त्र रखे हुए हों, कोई मुर्ख पुरुष चौसी(मोटे सूत) का कपड़ा पहन कर अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने लगे ॥१८॥ (२)
.
सुन्दर पंचामृत भखै, नितप्रति सहज सुभाइ । 
ताकै आगै राबरी, काहे कौ ले जाइ ॥१९॥
या कोई ऐसा धनपति, जो प्रतिदिन अपने घर में खीर, पूड़ी, हलवा, लड्डू, पेड़ा, बर्फी आदि मिठाइयाँ ही खाता है; उसके सम्मुख कोई मूर्ख पुरुष खाने के लिये जौ की राबड़ी१ लाकर रख दे ॥१९॥ (३) 
(१ उत्तर पश्चिम भारत में राबड़ी निर्धन लोगों का भोज्य पदार्थ है । जो छाछ में जौ का आटा नमक के साथ घोल कर अग्नि पर पका लिया जाता है ।)
(क्रमशः)  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें