बुधवार, 7 जनवरी 2026

*१५. मन कौ अंग ५३/५६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ५३/५६*
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तबही लौं मन कहत है, जब लग है अज्ञांन । 
सुन्दर भागै तिमर सब, उदै होइ जब भांन ॥५३॥
हमारा यह मन तभी तक इस भ्रमात्मक स्थिति में रहता है जब तक उस पर अविद्या(अज्ञान) का आवरण पड़ा हुआ है । परन्तु उस का यह अज्ञानान्धकार तभी नष्ट हो जाता है जब उस में गुरूपदिष्ट ज्ञानरूप सूर्य का उदय हो जाय ॥५३॥
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सुन्दर परम सुगन्ध सौं, लपटि रह्यौ निश भोर । 
पुण्डरीक परमातमा, चंचरीक मन मोर ॥५४॥
भगवदानुरागी मन : गुरूपदिष्ट ज्ञान के प्राप्त होते ही हमारा यह मन निरञ्जन निराकार प्रभु के चरणकमलों का उसी प्रकार दास बन जाता है जैसे कोई भ्रमर सुगन्ध के लोभ में कमल पुष्प के चारों ओर मण्डराता रहता है ॥५४॥
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सुन्दर निकसै कौंन बिधि, होइ रह्या लै लीन । 
परमानन्द समुद्र मैं, मग्न भया मन मीन ॥५५॥
जब साधक का मन उस निरञ्जन निराकार के परम आनन्दमय ध्यान में मग्न(समाधिस्थ) हो जाता है तो उसे वहाँ से वियुक्त करने का किस में साहस है । क्या महासमुद्र के जल में अतिशय स्नेहिल किसी मछली को जीवित अवस्था में कोई उस जल से वियुक्त कर पाया है ! ॥५५॥
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दृष्टि न फेरै नैंकहूं, नैंन लगै गोबिन्द ।
सुन्दर गति ऐसी भई, मन चकोर ज्यौं चन्द ॥५६॥ 
जैसे चकोर पक्षी चन्द्रमा को एक क्षण के लिये भी अपनी दृष्टि से दूर नहीं करना चाहता; वैसी ही स्थिति प्रभुचरणों में अनुरक्त साधक के मन की भी समझनी चाहिये ॥५६॥
(क्रमशः)

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