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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अथ अध्याय ११~१३ आचार्य उदयरामजी
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श्रीमानुदयरामाख्य: सिद्धेशो लोक पूजित: ।
संजातो भूत ले भूत्यै, जनानां धर्म सम्बिदो ॥१॥
आचार्य नारायणदासजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात् वि. सं. १९१२ कार्तिक कृष्णा ३ शुक्रवार को समाज ने उदयरामजी महाराज को आचार्य गद्दी पर विराजमान कराने का विचार किया । तब उस समय के भंडारी लच्छीराम जी ने कहा - गद्दी पर बैठने का मेरा अधिकार है, मैं बडा शिष्य व भंडारी हूँ । ऐसा कहकर कुछ युवक साधुओं की सहायता से स्वयं आचार्य गद्दी पर बैठना चाहते थे । आचार्य पद प्राप्ति के लिये उन्होंने और अनेक उपाय किये थे ।
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किन्तु आचार्य नारायणदासजी महाराज का संकेत उदयरामजी के भजन साधन, ब्रह्मचर्य, तप, साधुता, विचार शीलता, मिलन सारिता, शील स्वभाव, वाक्पटुता आदि सुन्दर गुणों को देखकर उदयरामजी को ही गद्दी के योग्य समझा था और आचार्य नारायणदासजी महाराज ने अपने अन्तिम समय में सब पंचायत के सामने अपने मस्तक की कपाली टोपी अपने हाथ से उतार कर उदयरामजी के शिर पर रखदी थी ।
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इससे उदयरामजी को ही योग्य अधिकारी समझकर दादूपंथी समाज ने आचार्य गद्दी पर बैठाया था । इससे रुष्ट होकर भंडारी लच्छीरामजी दादूद्वारा छोडकर अन्यत्र चले गये थे और आचार्य उदयरामजी को हटाकर स्वयं आचार्य बनने के प्रयत्न में लगे हुये थे ।
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एक दिन आचार्य उदयरामजी महाराज शौच क्रिया के लिये अकेले ही जंगल में गये थे । वहां भंडारी लच्छीराम जी के समर्थकों ने उन पर आक्रमण करके क्षति पहुँचाने की चेष्टा की, किन्तु सफल नहीं हो सके । कारण- एक तो आचार्य उदयरामजी महाराज तप तेज से संपन्न थे, दूसरे शारीरिक बल भी उनमें बहुत था । अत: अकेले आचार्य उदयरामजी महाराज ने ही उन सब को भगा दिया ।
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किन्तु जब स्थानीय साधु-महात्माओं को यह ज्ञात हुआ तब दुखित हुये और उस दिन ही आचार्य जी की शौच क्रिया के लिये महल के पास ही शौचालय बनवा दिया गया । अंत में भंडारी लच्छीरामजी और उनके समर्थकों के सब षड्यंत्र विफल हो गये । तब उन सबको समाज के आगे नत मस्तक होना ही पडा ।
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इधर आचार्य उदयरामजी महाराज अपने प्रतिपक्षी भंडारी लच्छीरामजी तथा उनके समर्थको को कुछ भी नहीं कहते थे । उनके सभी आघातों को सहन कर लेते थे । यही उनकी विशेषता थी । इसी से अन्त में विरोधियों को उनके सामने झुकना ही पडा था ।
(क्रमशः)

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