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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि ।*
*साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥२२॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी ने और भी कहा है, -
"... फिर से कालचक्र घूमकर आ रहा है, एक बार फिर भारत से वही शक्तिप्रवाह निःसृत हो रहा है, जो शीघ्र ही समस्त जगत् को प्लावित कर देगा । एक वाणी मुखरित हुई है, जिसकी प्रतिध्वनि चारों ओर व्याप्त हो रही है एवं जो प्रतिदिन अधिकाधिक शक्ति संग्रह कर रही है, और यह वाणी इसके पहले की सभी वाणियों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है, क्योंकि यह अपने पूर्ववर्ती उन सभी वाणियों का समष्टिस्वरूप है ।
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जो वाणी एक समय कलकल-निनादिनी सरस्वती के तीर पर ऋषियों के अन्तस्तल में प्रस्फुटित हुई थी, जिस वाणी ने रजतशुभ्रहिमाच्छादित गिरिराज हिमालय के शिखर-शिखर पर प्रतिध्वनित हो कृष्ण, बुद्ध और चैतन्यदेव में से होते हुए समतल प्रदेशों में अवरोहण कर समस्त देश को प्लावित कर दिया था, वही वाणी एक बार पुनः मुखरित हुई है । एक बार फिर से द्वार खुल गये हैं । आइये, हम सब आलोक-राज्य में प्रवेश करें - द्वार एक बार पुनः उन्मुक्त हो गये हैं । ..." -'हमारा भारत' से उद्धृत
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इसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द ने भारतवर्ष के अनेक स्थानों में अवतार-पुरुष श्रीरामकृष्ण के आगमन की वार्ता घोषित की । जहाँ जहाँ मठ स्थापित हुए हैं, वहाँ उनकी प्रतिदिन सेवा-पूजा आदि हो रही है । आरती के समय सभी स्थानों में स्वामीजी द्वारा रचित स्तव वाद्य तथा स्वर-संयोग के साथ गाया जाता है ।
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इस स्तव में स्वामीजी ने भगवान् श्रीरामकृष्ण को सगुण निर्गुण निरंजन जगदीश्वर कहकर सम्बोधित किया है - और कहा है, "हे भवसागर के पार उतारनेवाले ! तुम नररूप धारण करके हमारे भवबन्धन को छिन्न करने के लिए योग के सहायक बनकर आये हो । तुम्हारी कृपा से मेरी समाधि हो रही है । तुमने कामिनी-कांचन छुड़वाया है । हे भक्तो को शरणदेनेवाले, अपने चरण-कमलों में मुझे प्रेम दो । तुम्हारे चरणकमल मेरी परम सम्पद् हैं । उसे प्राप्त करने पर भवसागर गोष्पद जैसा लगता है ।"
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स्वामीजी-रचित श्रीरामकृष्ण-आरती ।
(मिश्र-चौताल)
खण्डन भव-बन्धन, जग-वन्दन, वन्दि तोमाय ।
निरंजन, नररूपधर, निर्गुण, गुणमय
मोचन-अघदूषण, जगभूषण, चिद्घनकाय ।
ज्ञानांजन-विमल-नयन, वीक्षणे मोह जाय ॥
भास्वर भाव-सागर, चिर-उन्मद प्रेम-पाथार ।
भक्तार्जन-युगलचरण, तारण भव-पार ॥
जृम्भित-युग-ईश्वर, जगदीश्वर, योगसहाय ।
निरोधन, समाहित मन, निरखि तव कृपाय ॥
भंजन-दुःखगंजन, करुणाघन, कर्म-कठोर ।
प्राणार्पण-जगत-तारण, कृन्तन-कलिडोर ॥
वंचन-कामकांचन, अतिनिन्दित-इन्द्रिय-राग ।
त्यागीश्वर, हे नरवर, देह पदे अनुराग ॥
निर्भय, गतसंशय, दृढ़निश्चयमानसवान् ।
निष्कारण-भकत-शरण त्यजि जातिकुलमान ॥
सम्पद तव श्रीपद, भव गोष्पद-वारि यथाय ।
प्रेमार्पण, समदर्शन, जगजन-दुख जाय ॥
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*जो राम, जो कृष्ण, इस समय वही रामकृष्ण*
काशीपुर बगीचे में स्वामीजी ने यह महावाक्य भगवान श्रीरामकृष्ण के श्रीमुख से सुना था । इस महावाक्य का स्मरण कर स्वामीजी ने विलायत से कलकते में लौटने के बाद बेलुड़ मठ में एक स्तोत्र की रचना की थी ।
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स्तोत्र में उन्होंने कहा है - जो आचण्डाल दीन-दरिद्रों के मित्र, जानकीवल्लभ, ज्ञान-भक्ति के अवतार श्रीरामचन्द्र हुए, जिन्होंने फिर श्रीकृष्ण के रूप में कुरुक्षेत्र में गीतारूपी गम्भीर मधुर सिंहनाद किया था, वे ही इस समय विख्यात पुरुष श्रीरामकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए हैं ।
(क्रमशः)
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