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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग ५/८*
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सीत काल जल मैं रहै, करै कामना मूढ ।
सुन्दर कष्ट करै इतौ, ज्ञान न समझै गूढ ॥५॥
इसी प्रकार, तूं शीत ऋतु में ठण्ढे जल में बैठ कर अपनी अन्य कामनापूर्ति की आशा लगाने लगता है । तूं अपने शरीर को इतना कष्ट क्यों देता है ! क्या तुझे अभी तक गुरूपदिष्ट ज्ञान का गूढ रहस्य ज्ञात नहीं हुआ ! ॥५॥
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उष्ण काल चहुं वौर तैं, दीनी अग्नि जराइ ।
सुन्दर सिर परि रवि तपै, कौंन लगी यह वाइ ॥६॥
इसी प्रकार, ग्रीष्म ऋतु में अपने चारों ओर प्रचण्ड अग्नि जला कर ऊपर से सर्य की प्रखर धूप सहता है । यह तुझे कौन उन्माद(पागलपन) सवार हुआ है ! ॥६॥
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बन बन फिरत उदास ह्वै, कंद मूल फल खात ।
सुन्दर हरि कै नाम बिन, सबै थोथरी बात ॥७॥
कभी तूं वन में फिरता हुआ खट्टे या कड़ुवे कन्द, मूल या फल खाकर अपना जीवन बिताता है । अरे भाई ! हरिनामस्मरण के बिना ये सब उपरिवर्णित, उपाय थोथे(निःसार) ही माने जाते हैं ॥७॥
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कूकस कूटहिं कन बिना, हाथ चढै कछु नांहिं ।
सुन्दर ज्ञान हृदै नहीं, फिरि फिरि गोते खांहिं ॥८॥
कण(अन्न) रहित केवल कूकस(तुष = धान के ऊपर का छिलका) कूटने से तुम्हारा कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा । यदि तुम्हारा हृदय गुरु द्वारा उपदिष्ट ज्ञान में नहीं लगा है तो तुम्हारा संसार में यह निरर्थक आना जाना इसी प्रकार लगा रहेगा ! ॥८॥
(क्रमशः)

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