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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*करणी कठिन होत नहिं मोपै,*
*क्यों कर ये दिन भरते ।*
*लालच लाग परत पावक में,*
*आपहि आपै जरते ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*अवतार के लक्षण । ईसा मसीह*
अवतार-पुरुष क्या कहने के लिए आते हैं ? श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र से कहा था, "भैया, कामिनी-कांचन का त्याग किये बिना न होगा । ईश्वर ही वस्तु है, बाकी सभी अवस्तु हैं ।" स्वामीजी ने भी अमरीकनों से कहा –
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“...... हम अपने आलोच्य महापुरुष, जीवन के इस दिव्य-संदेशवाहक(ईसा) के जीवन का मूलमन्त्र यही पाते हैं कि 'यह जीवन कुछ नहीं है, इससे भी उच्च कुछ और है'..... । उन्हें इस नश्वर जगत् व उसके क्षणभंगुर ऐश्वर्य में विश्वास नहीं था ।... ईसा स्वयं त्यागी व वैराग्यवान् थे, इसलिए उनकी शिक्षा भी यही है कि वैराग्य या त्याग ही मुक्ति का एकमेव मार्ग है, इसके अतिरिक्त मुक्ति का और कोई पथ नहीं है ।
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यदि हममें इस मार्ग पर अग्रसर होने की क्षमता नहीं है, तो हमें मुख में तृण धारण कर विनीत भाव से अपनी यह दुर्बलता स्वीकार कर लेनी चाहिए कि हममें अब भी 'मैं' और 'मेरे' के प्रति ममत्व है, हममें धन और ऐश्वर्य के प्रति आसक्ति है । हमें धिक्कार है कि हम यह सब स्वीकार न कर, मानवता के उन महान् आचार्य का अन्य रूप से वर्णन कर उन्हें निम्न स्तर पर खींच लाने की चेष्टा करते हैं ।
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उन्हें पारिवारिक बन्धन नहीं जकड़ सके । क्या आप सोचते हैं कि ईसा के मन में कोई सांसारिक भाव था ? क्या आप सोचते हैं कि यह ज्ञानज्योतिस्वरूप अमानवी मानव, यह प्रत्यक्ष ईश्वर पृथ्वी पर पशुओं का समधर्मी बनने के लिए अवतीर्ण हुआ ? किन्तु फिर भी लोग उनके उपदेशों का अपनी इच्छानुसार अर्थ लगाकर प्रचार करते हैं ।
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उन्हें देह-ज्ञान नहीं था, उनमें स्त्री-पुरुष भेदबुद्धि नहीं थी - वे अपने को लिंगोपाधिरहित आत्मास्वरूप जानते थे । वे जानते थे कि वे शुद्ध आत्मास्वरूप हैं - देह में अवस्थित हो मानवजाति के कल्याण के लिए देह का परिचालन मात्र कर रहे हैं । देह के साथ उनका केवल इतना ही सम्पर्क था । आत्मा लिंगविहीन है । विदेह आत्मा का देह व पाशवभाव से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।
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अवश्यमेव त्याग व वैराग्य का यह आदर्श साधारण जनों की पहुँच के बाहर है । कोई हर्ज नहीं, हमें अपना आदर्श विस्मृत नहीं कर देना चाहिए - उनकी प्राप्ति के लिए सतत यत्नशील रहना चाहिए । हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि त्याग हमारे जीवन का आदर्श है, किन्तु अभी तक हम उस तक पहुँचने में असमर्थ हैं ।..."
(क्रमशः)

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