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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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उतराध(हरियाणा) की रामत ~
हांसी से विदा होकर आचार्य उदयरामजी महाराज उतराध की रामत करने पधारे । जहां- जहां स्थानधारी साधुओं तथा सेवकों का आग्रह था वहां-वहां पधार कर अपने दर्शन सत्संग से उनको आनन्दित किया । इस रामत में बालक निश्चलदासजी को देखकर आचार्य उदयरामजी ने कह दिया था कि - यह महान् विद्वान् होगा ।
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कहा भी है -
संतों को हो जात है, होनहार का ज्ञान ।
उदयराम ने कराया, निश्चल का सम्मान ॥३१७ ॥द्द. त. ११
उतराध की रामत करके फिर नारायणा दादूधाम की ओर चले । मार्ग के निज सेवकों तथा धार्मिक जनता को निर्गुण ब्रह्म भक्ति का उपदेश करते हुये शनै: शनै नारायणा दादूधाम दादूद्वारे में पधार गये और यहां भजन उपदेश करने लगे ।
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दयालपुरा का चातुर्मास ~
वि. सं. १९२२ के चातुर्मास का निमंत्रण आचार्य उदयरामजी महाराज को चम्पादासजी दयालपुरा वालों ने दिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य उदयरामजी महाराज ने शिष्य संत मंडल के सहित नारायणा दादूधाम से चातुर्मास करने के लिये दयालपुरा को प्रस्थान किया । मार्ग के स्थानधारी साधुओं तथा सेवकों को अपने दर्शन सत्संग से आनन्दित करते हुये समय पर दयालपुरा पहुंच गये ।
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चम्पादास जी ने विधि विधान से आचार्य जी का सामेला किया और ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के कार्यक्रम नियम पूर्वक प्रतिदिन होने लगे । प्रात: दादूवाणी की कथा, पद गायन, संकीर्तन, फिर भोजन की पंक्ति । मध्य दिन का सत्संग, पदगायन, नाम कीर्तन, सायं आरती ‘दादूराम’ मंत्र की ध्वनि ।
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जागरण के दिन जागरण होता था । आस- पास के स्थानधारी साधुओं की रसोइंया भी आती थीं । चातुर्मास समाप्ति के दिन तो आसपास के साधुओं व सेवकों का मेला सा हो गया था । समाप्ति के दिन दादूवाणी जी की आरती उतारी गई । आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट दी । संतों को वस्त्र दिये । आज भोजन के समय पंक्ति भी विशाल लगी थी ।
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श्वेत हंसों की सी पंक्ति विराज रही थी । बीच-बीच में कषाय वस्त्र धारी विरक्त दिखाई दे रहे थे और वैसे ही विशाल जटाधारी तपस्वी संतों के भी बीच-बीच में दर्शन हो रहे थे । दर्शकों के हृदय के आनन्द को बढाती हुई संत पंक्ति निर्गुण ब्रह्म के भोग लगाकर आचार्य जी के आज्ञा देने पर निरंजन राम को स्मरण करते हुये जीमने लगी ।
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भोजन पूरा हो जाने पर वृद्ध(ब्रह्म) भगवान की, दादूजी की, अन्य श्रेष्ठ संतों और नारायणा दादूधाम के आचार्यों की जय बोलकर पंक्ति उठ गई । उक्त प्रकार आज का संतों का मेला अच्छा रहा । दूसरे दिन आये हुये अपने प्रिय अतिथियों को सप्रेम विदा कर दिया । आचार्यजी को भी विधि विधान से विदा करके आशीर्वाद प्राप्त किया ।आचार्यजी दयालपुरा से विदा होकर शनै: शनै: मार्ग की धार्मिक जनता को अपने दर्शन सत्संग से सुख प्रदान करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
(क्रमशः)

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