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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग २९/३२*
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काम कोध जिनि कै नहीं, लोभ मोह पुनि नांहिं ।
सुन्दर ऐसै संतजन, दुर्लभ या जगु मांहिं ॥२९॥
जिस उत्तम साधक के हृदय में किसी भी प्रकार के काम क्रोध आदि विकार नहीं है, तथा किसी भी प्रकार के लोभ या मोह से भी वह दूर रहता है ऐसा साधक ही 'सन्त' कहलाता है । ऐसा सन्त इस संसार में बहुत दुर्लभ माना जाता है ॥२९॥
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मद मत्सर अहंकार की, दीन्ही ठौर उठाइ ।
सुन्दर ऐसै संतजन, ग्रंथनि कहे सुनाइ ॥३०॥
जिस साधक ने अपने चित्त को मद(स्वकीय शारीरिक रूप आदि का वृथाभिमान) एवं मत्सर(दूसरों से ईर्ष्या) से सर्वथा दूर कर लिया है ऐसे सन्त जनों की ही वेद पुराण आदि सच्छास्त्रों में प्रशंसा की गयी है ॥३०॥
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पाप पुन्य दोऊ परै, स्वर्ग नरक तें दूरि ।
सुन्दर ऐसै संतजन, हरि कैं सदा हजूरि ॥३१॥
जो पाप एवं पुण्य की वासनाओं से सदा दूर रहता है, एवं स्वर्ग एवं नरक कामनाओं से भी दूर रहता है; महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते है - ऐसे सन्तजन ही हरिभक्ति में निरन्तर लगे रहने में(तत्पर रहने में) समर्थ होते हैं ॥३१॥
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आये हर्ष न ऊपजै, गयें शोक नहिं होइ ।
सुन्दर एसै संतजन, कोटिनु मध्ये कोइ ॥३२॥
जिस साधक को किसी सांसारिक वस्तु की प्राप्ति पर कोई हर्ष नहीं होता, या उसके नष्ट होने पर कोई कष्ट नहीं होता; श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसा साधक सन्त करोड़ों साधकों में कोई एक होता है१ ॥३२॥
{१ तु० भगवद्गीता – यो न ह्रष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । (१२/१७)}
(क्रमशः)

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