शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

*भ्रमविध्वंश ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू नाम निमित रामहि भजै,*
*भक्ति निमित भजि सोइ ।*
*सेवा निमित सांई भजै, सदा सजीवन होइ ॥*
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*भ्रमविध्वंश ॥*
उघर्यौ जै चाहै तौ, तूँ राम भजन करि ।
हरि का चरण कवल हिरदै धरि ॥टेक॥
न करसी आन सेवा, सबै झूठ जाणी ।
रीत्याँ तलायाँ झूलै, तहाँ नहीं पाणी ॥
सी कै पहाड़ि पैठा, वोट कैसे राखै ।
धुँवरि धान न होई, ज्यूँ मेहा पाखै ॥
भेड़ कै पूछड़ै लागा, समदि कैसे तारै ।
बाण्याँ की बहु बापड़ी, चौर नैं क्यूँ मारै ॥
छाली के गलि गलथणाँ, दूध न होई ।
बषनां साध बिचारैगा कोई१ ॥४९॥
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(१ मंगलदासजी महाराज की पुस्तक में इस पंक्ति का पाठ “बषनां यह बात साध, बिचारेगा कोई” है ।)
यदि तू मुक्त होना चाहता है तो रामजी का सतत् तैलधारावत् स्मरण आकर । स्मरण करते समय चित्त-वृत्ति-निरोधार्थ हरि के चरणकमलों को हृदय में स्थापित करके रख । निर्गुणी संतों का राम निराकार है । अतः वे किन चरणकमलों को अपने हृदय में स्थापित करें ?
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वस्तुतः निर्गुणी संत जब इस प्रकार की बातें करते हैं तब उनका तात्पर्य शब्द स्वरूपी रामजी से होता है और शब्द स्वरूपी रामजी के अर्थ का चिंतन ही उनके रूप-स्वरूप, चरणकँवलों का चिंतन है । स्वामी रामचरणजी महाराज ने स्पष्ट कहा है –
“राखै सुरति सबद ही माँहीं । सबद छाँडि कहुँ अंत न जाँहीं ॥’ योगसूत्रकार का कथन इसकी पुष्टि करता है । तस्य वाचकः प्रणवः ॥२७॥ तज्जपस्तदर्थ भावनम् ॥२८॥” समाधिपाद ॥
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अन्य समस्त देवी-देवताओं को झूठा जानकर उनकी सेवा-पूजा मत कर । उनकी पूजा करना ठीक वैसे ही व्यर्थ है जैसे बिना जल की ताल में तैरना व्यर्थ हो जाता है क्योंकि उसमें जल का लेश भी नहीं होता है ।
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शीतकोट = ओस आदि के कारण दीख पड़ने वाले कोट-किले, पहाड़ अपनी छाया में कैसे किसी को रख सकते हैं जबकि वे स्वयं ही मिथ्या हैं क्योंकि जैसे ही सूर्य का उदय होता है, वैसे ही इन शीतकोट, पहाड़ादि का नाश हो जाता है ।
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इसी प्रकार बिना मेघ-वर्षा के धुँवरि – ओस के कणों से अन्न उत्पन्न नहीं हो सकता । जिन लोगों ने तैरना न जानने वाली भेड़ रूपी माया का आश्रय ले रखा है वे कैसे संसार रूपी समुद्र का लंघन कर सकते हैं । निर्बल बणिकपुत्र की बेचारी स्त्री माया काम-क्रोध-लोभ-मोह एवं त्रिगुणों रूपी चोरों को कैसे मार सकती है ।
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बकरी के गले के स्तनों से कभी भी दूध की प्राप्ति नहीं हो सकती क्योंकि उनमें दूध होता ही नहीं है । बषनां कहता है तो विचारवान साधु होता वही उक्त झूठे जंजालों को छोड़कर नित्य-सनातन-परब्रहम-परमात्मा का चिंतन-मनन करेगा ॥४९॥
(क्रमशः)

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