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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ४१/४४*
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सूधि माहिं बरतै सदा, और न जानहिं रंच ।
सुन्दर ऐसै संतजन, जिनि कै कछु न प्रपंच ॥४१॥
ऐसे सन्तजन, आठों पहर निरन्तर अपने निरञ्जन निराकार प्रभु की शोध(खोज) में लगे रहते हैं । उन को अन्य सांसारिक प्रपञ्च से कोई सम्बन्ध रखने की कोई इच्छा नहीं रहती । संसार से दूर रहने वाले ऐसे ही साधक वास्तविक 'सन्त' कहलाते हैं ॥४१॥
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सदा रहै रत राम सौं, मन मैं कोउ न चाह ।
सुन्दर ऐसै संतजन, सबसौं बेपरवाह ॥४२॥
जो साधक निष्काम भाव से 'राम' नाम के चिन्तन में लगे रहते हैं । ऐसे सन्तजन ही संसार से निरपेक्ष व्यवहार करने में समर्थ होते हैं ॥४२॥
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धोवत है संसार सब, गंगा मांहें पाप ।
सुन्दर संतनि के चरण, गंगा बंछै आप ॥४३॥
श्रीसुन्दरदासजी ऐसे सन्तों का गुणगान करते हुए कहते हैं - जब सांसारिक प्राणी, अपने पापों को धोने के लिये, गङ्गा में डुबकी(गोता) लगाते हैं; तब वही गङ्गा, उन पापों से मुक्ति हेतु, सन्तों के चरणस्पर्श की कामना करती रहती है१ ॥४३॥ (१ तु० करु मन उन संतन को सेवा..... जाके चरणकमल कूं वांछत, गंगा जमुना रेवा ॥ श्रीसुन्दरदासजी का पद)
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ब्रह्मादिक इंद्रादि पुनि, सुन्दर बंछहिं देव ।
मनसा बाचा कर्मना, करि संतनि की सेव ॥४४॥
इतना ही नहीं; ब्रह्मा, इन्द्र आदि समर्थ देव भी मनसा वाचा कर्मणा उन सन्तों के चरणों की सेवा करने में निरन्तर स्पृहा करते रहते हैं ॥४४॥
(क्रमशः)

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