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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ४५/४८*
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सुन्दर कृष्ण प्रगट कहै, मैं धारी यह देह ।
संतनि कै पीछै फिरौं, सुद्ध करन कौं येह ॥४५॥
भगवान् कृष्ण ने तो साक्षात् अपने श्रीमुख से कहा है कि मैंने अपने यह शरीर शुद्ध(निष्कलंक) करने के लिये ही यह अवतार लिया है ॥४५॥
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संतनि की महिमा कही, श्रीपति श्रीमुख गाइ ।
तातें सुन्दर छाडि सब, सन्त चरन चित लाइ ॥४६॥
इस प्रकार, जब लक्ष्मीपति भगवान् ने स्वयं श्रीमुख से सन्तों की चरणपूजा की महिमा बखान की है तो श्रीसुन्दरदासजी भी साधक को यही सत्परामर्श दे रहे हैं कि तूं भी समस्त सांसारिक प्रपन्च त्याग कर केवल सन्तों की सङ्गति में ही अपना ध्यान लगा ॥४६॥
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संतनि की सेवा किये, श्रीपति होहि प्रसन्न ।
सुन्दर भिन्न न जानिये, हरि अरु हरि के जन्न ॥४७॥
श्रीसुन्दरदासजी सत्सङ्गति का एक अन्य लाभ भी बता रहे हैं - इस सत्सङ्गति(सन्तों की सेवा) से देवाधिदेव(श्रीपति) भगवान् भी प्रसन्न होते हैं । अतः उन दोनों को अभिन्न जान कर तूं भी उन(सन्तों) के चरणों की सेवा कर ॥४७॥
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सुन्दर हरि जन एक हैं, भिन्न भाव कछु नांहि ।
संतनि माहें हरि बसै, संत बसै हरि मांहिं ॥४८॥
हरि एवं हरिभक्त - दोनों एक हैं, उन को भिन्न(पृथक) न समझ; क्योंकि सन्तों के हृदय में हरि का वास है और हरि के हृदय में सन्तों(भक्तों) का वास है ॥४८॥
(क्रमशः)

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