शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

ब्रह्मलीन होना ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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ब्रह्मलीन होना ~ 
उक्त  प्रकार आचार्य हरजीरामजी महाराज ६ वर्ष ४ मास २५ दिन गद्दी पर विराज कर वि. सं. १९५५ वैशाख शुक्ला १० रविवार को ब्रह्मलीन हुये थे । आप महान् संत थे । गद्दी पर विराजने से पूर्व भी आपने अपना जीवन ब्रह्म भजन में व्यतीत किया था और आचार्य पद प्राप्ति के पश्‍चात् भी आप ने ब्रह्म भजन, उपदेश आदि परमार्थ के कार्यों में ही मन रखा था । आप सर्व हितेषी महात्मा थे । आपने अपने अधार्मिक जनता को भी ईश्‍वर की ओर लगाया था ।
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गुण गाथा दोहा- 
हरि में हरजीराम का, चित रहा सब काल ।  
इस से शरणागतों को, करते रहे निहाल ॥१॥
हरजिरामजी के रहे, उन्नत सदा विचार । 
इस कारण उनका चला, सम्यक् सब व्यवहार ॥२॥
आचार्य हरजिराम की, बुद्धि ब्रह्म में लीन ।
रही इसी से वे हुये, परमार्थ सु प्रवीन ॥३॥ 
अपने जीवन काल में, ले दादू आधार ।  
हरजिराम करते रहे, दादूवाणि प्रचार ॥४॥
दादूवाणी का सदा, हिय में धरा विचार ।
इस से हरजीराम जी, संतत रहे उदार ॥५॥
हर रु राम की एकता, हरजिराम में देख ।
‘नारायण’ निश्‍चय हुआ, सब में एक अलेख ॥६॥
हर रु राम का भेद तो, है अबोध से जान । 
क्षय कर अबोध इक हुये, हरजीराम सुजान ॥७॥
ब्रह्म ज्ञान हो जाय तब, भेद रहे नहिं लेश । 
ज्ञानी हरजीराम ने, हता द्वैत का क्लेश ॥८॥ 
हरजिराम आचार्य की, निष्ठा और विचार । 
लख ‘नारायण’ करत है, वन्दन बारंबार ॥९॥
इति श्री द्वादश अध्याय समाप्त: १२ 
(क्रमशः)

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