मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

*राम-रसायन ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*राम रसायन भर भर पीवै,*
*दादू जोगी जुग जुग जीवै ।*
*संयम सदा, न व्यापै व्याधी,*
*रहै निरोगी लगै समाधी ॥*
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*राम-रसायन ॥*
जीवै रे सो जीवै रे । जो राम रसायण पीवै रे ॥टेक॥
जो सकल साधना साधै, घर जाइ बनखँडि बाँधै ।
तटाँ तीरथाँ जे उबरै, तौ कासी बसै सु क्याँहनैं मरै ॥
षणदावण बहु करता, सर्वदेव चित धरता ।
भोपा भोपी बूझै, सो कहीं जीवता सूझै ॥
वोषदि मूली जाकै, पुस्तक पोथी ताकै ।
जड़ियाँ बूटियाँ जे कोइ उबरै, तौ बैद धनंतर क्याँहनैं मरै ॥
आदि अंति जे जीया, त्याँह राम रसायण पीया ।
बषनां जुग जुग जीवै, सो राम रसायण पीवै ॥४५॥
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जो रामनाम रूपी रसायन का पान करता है, वह हमेशा-हमेशा जीवित रहता है, अमर हो जाता है । इसके विपरीत जो अन्य समस्त प्रकार की साधनाओं को साधते हैं; घर से निकलकर वनखंड में जाकर रहते हैं,
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नदियों के तटों और तीर्थों का सेवन करके अमर होने की आशा करते हैं, काशी में निवास करते हैं, ऐसा करने से यदि अमरत्व(उबरै) की प्राप्ति होती हो तो फिर वे मरते क्यों हैं ? अर्थात् उन्हें मरना नहीं चाहिये किन्तु वे मरते हैं ।
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इससे सिद्ध होता है ये सभी साधन अमरत्व प्रदान करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं । जो खणदावण = यंत्र-मन्त्रादि की साधना करते हैं: निरंजन-निराकार-स्वात्म-तत्वातिरिक्त अन्य देवी-देवों का भजन-कीर्तन स्मरण करते हैं, देवी-भैरवादि के सेवक, घुड़ले आदियों से नाना प्रश्नादि पूछकर आगामी योजना बनाते हैं उनमें से बताइये, आज कौन जीवित है ?
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अर्थात् उनमें से किसी को भी अमरत्व की प्राप्ति नहीं हुई । जिनके पास पुस्तक पोथी और गुरुपरंपरा से प्राप्त तरह-तरह की औषधियाँ = रस-रसायन, जड़ी-बूँटी हैं । बूँटियों वाले, रस-रसायन वाले अमर हो जाते हों तो धनवंतरि जैसे सिद्ध वैद्यादि क्यों मरते ?
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वस्तुतः जिन्होंने रामनाम का रसायन पीया है, वे ही प्रारम्भ से अंत तक जीवित रहते हैं । बषनां जी कहते हैं वे ही युग-युगों तक जीते हैं जो निरन्तर रामरसायन का पान करते हैं ॥४५॥
(क्रमशः)

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