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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग २५/२८*
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राज साज सब होत है, मन बंछित हू खाइ ।
सुन्दर दुर्लभ संतजन, बड़े भाग तें पाइ ॥२५॥
इसी प्रकार कोई चाहे तो वह राज्यसुख या विपुल ऐश्वर्य का उपभोग भी यथेच्छ प्राप्त कर सकता है; परन्तु ऐसे लोगों के लिये भी सन्त जनों का समागम तो विपुल सौभाग्य से ही अधिगत हो सकता है ॥२५॥
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लोक प्रलोक सबै मिलै, देव इंद्र हू होइ ।
सुन्दर दुर्लभ संतजन, क्यौं करि पावै कोइ ॥२६॥
अधिक क्या कहें, लोक या परलोक का सुखमय जीवन यहाँ तक कि देवलोक का इन्द्रासन भी अपेक्षाकृत सहजता से पाया जा सकता है; परन्तु यह दुर्लभ सन्तसमागम(सत्संग) तो लाखों में किसी एक सौभाग्यशाली साधक को ही मिल पाता है ॥२६॥
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ब्रह्मा शिव कै लोक लौं, ह्वै बैकुंठहु बास ।
सुन्दर और सबैं मिलै, दुर्लभ हरि के दास ॥२७॥
यदि कोई दृढ संकल्प कर ले तो वह ब्रह्मलोक, शिवलोक या वैकुण्ठलोक तक भी पहुँच सकता है । कहने का तात्पर्य यह है कि उसे संसार का दुर्लभ से दुर्लभ पदार्थ मिल सकता है; परन्तु किसी सन्त का मिलना तो उसके लिये भी दुर्लभ ही है ॥२७॥
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राग द्वेष ते रहित हैं, रहित मान अपमान ।
सुन्दर ऐसै संतजन, सिरजे श्री भगवान ॥२८॥
दुर्लभ सन्त के लक्षण : जो सांसारिक राग द्वेष से रहित है, तथा जो समाज में अपने मान अपमान का कोई महत्व नहीं देता; श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं, ऐसा लगता है कि मानों ऐसे सन्त को भगवान् ने स्वयं अपने हाथों बनाया है ॥२८॥
(क्रमशः)

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