मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ९/१२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाण टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ९/१२*
.
*चंद उदय ज्यों चाह बिन, कमल खिले अपभाय ।*
*त्यों रज्जब गुरु शिष्य ह्वै, तो दोष न दीया जाय ॥९॥*
९-१५ तक स्वार्थ रहित गुरु का परिचय दे रहे हैं - चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा की बिना इच्छा ही अपने भाव से चन्द्रमुखी कमल खिलते हैं, वैसे ही सद्गुरु के दर्शन होने पर यदि कोई अपने भाव से शिष्य बनता है तो गुरु को स्वार्थी होने का दोष नहीं दिया जा सकता ।
.
*चंदन करि बदले वनी, पारस पलटे लोह ।*
*त्यों रज्जब शिष काज कर, गुरु ज्ञाता निरमोह ॥१०॥*
जैसे चन्दन की सुगन्धि द्वारा वन बदलता है, पारस से लोह बदलता है, वैसे ही शिष्य को बदलने का काम करके भी ज्ञानी गुरु शिष्यों में मोह नहीं करते ।
.
*सद्गुरु सूरज शशिहर संदल१, पुनि पेखे त्यों हमाय२ ।*
*रज्जब पंचहुँ प्राण पोषिये, स्वारथ रहित सुभाय३ ॥११॥*
सद्गुरु सूर्य चन्द्रमा, चन्दन१ और हुमा२ पक्षी इन पाँचो को ही देखिये प्राणियों का पोषण करके भी स्वभाव३ से ही स्वार्थ रहित रहते हैं ।
.
*जिहिं छाया ह्वै छत्रपति, सो हित रहित हमाय ।*
*त्यों रज्जब गुरु शिष्य गति, दुहुँ में कौन कमाय ॥१२॥*
जिस हुमा पक्षी की छाया शिर पर पड़ने से मनुष्य राजा हो जाता है, वह पक्षी अपने स्वार्थ के लिये तो छाया नहीं पटकता, वैसे ही गुरु भी अपने स्वार्थ के लिए उपदेश नहीं देते । हुमा और गुरु इन दोनों में से कौन- सा क्या कमाता है ? कुछ नहीं, अत: स्वार्थ रहित हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें