मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

नाम चिन्तन ही परम सुख

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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एक दिन पटियाला नरेश उपेन्द्रसहजी सत्संग समाप्ति के पश्‍चात् कुछ ठहरे रहे । सब श्रोताओं के चले जाने के पश्‍चात् राजा उपेन्द्रसिंहजी ने पूछा मनुष्य की क्या राशि है ? पास बैठे हुये साधु बोदूरामजी ने कहा- सिंह राशि है । बोदूरामजी का उक्त वचन सुनकर राजा उपेन्द्रसिंहजी ने उनसे कहा- मैं आपसे नहीं पूछ रहा हूँ, महाराज से पूछ रह हूं । 
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यह सुनकर आचार्य दयारामजी महाराज बोले- राजन् ! राशि जेवडी के विचार के लिये हमें दादूजी महाराज ने अवकाश ही नहीं दिया है । उसकी खोज के लिये हमारे को अवकाश होता तो अवश्य बता देते । हमें दादूजी महाराज ने जो कहा हैं, उसी कार्य में अवकाश नहीं मिल रहा है देखिये-  
‘‘दादू नीका नाम है, तीन लोक तत सार ।  
रात दिवस रटबों करी, रे मन यही विचार ॥’’
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अर्थात् दादूजी महाराज कहते हैं- हे सुख की इच्छा करने वाले मानव ! परमात्मा का नाम चिन्तन ही परम सुख का सुन्दर साधन है । अन्य अर्थादि साधन से परम सुख नहीं मिलता, दु:ख से मिश्रित अल्प सुख ही मिलता है । परमेश्‍वर का नाम तीनों लोकों के सार तत्त्व परब्रह्म को प्राप्त करने का श्रेष्ठ उपाय है । अत: अन्य सब उपायों को त्याग करके एक परब्रह्म के नाम का ही चिन्तन करो । 
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रे चपल मन मानव ! भली भाँति विचार करके  यह उक्त उपाय अर्थात् दिन रात नाम चिन्तन ही कर । राजन् ! उक्त प्रकार दादूजी महाराज हमें रात दिन नाम चिन्तन की आज्ञा देते हैं । रात दिन को छोडकर अन्य कौन सा समय है जिस में हम राशि जेवडी का विचार करें । इतना कहकर आचार्य दयारामजी मौन हो गये ।
फिर राजा उपेन्द्रसिंह ने भी नत- मस्तक  होकर मान लिया कि - आपका यह विचार अति उत्तम है । महात्माओं को तो भजन ही करना चाहिये । आगे मैं भी किसी संत से ऐसा प्रश्‍न नहीं करुंगा । फिर राजा प्रणाम करके राजभवन को चला गया । उक्त घटना से दयारामजी महाराज की बुद्धि का परिचय मिलता है । 
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कुछ समय तक पटियाला की जनता को अपने दर्शन तथा उपदेशों से आनन्दित करते हुये पटियाला में निवास किया । पटियाला से पधारने लगे तब पटियाला नरेश उपेन्द्रसिंहजी ने अति श्रद्धा भक्ति से आचार्य दयारामजी महाराज के ७००) रु. भेंट किये । पटियाला की भक्त जनता ने भी अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंटें दीं और राजा प्रजा ने सस्नेह आचार्य दयारामजी महाराज को विदा किया ।  
(क्रमशः) 

 

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