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🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू कहै, सो गुरु किस काम का,*
*गहि भ्रमावै आन ।*
*तत्त बतावै निर्मला, सो गुरु साध सुजान ॥*
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*नाम-महिमा ॥*
बैद बुराई कीन्हीं रे, औषद या जिनि दीन्हीं रे ॥टेक॥
करम कटै सो औषद नांहीं, औषद बिषै बिकारा ।
अजाण बैद जोराँ तुलि कहिये, तिहिं मार्यौ संसारा ॥
निर्गुण नींब पिलायौ नांहीं, सरगुण हिरदै धार्यौ ।
इहिं ओसै संसार सवायौ, बैद निपूतै मार्यौ ॥
निर्गुण नाउँ नींब सौ खारौ, या औषद थीबाइ ।
बषनौं कहै बिचारी नांहीं, घी समि सहत खुवाइ ॥५७॥
विषय-विकार, कर्मबंधन रूपी बीमारी को समाप्त करने के लिये वैद्य(गुरु-उपदेशक) ने सही औषधि उपदेश) नहीं दी । वैद्य ने यही सबसे बुरा कार्य किया । जिस औषधि से कर्म कटते हैं, वैद्य ने वह औषधि नहीं दी । उल्टे उसने तो वे औषधियाँ दीं जिनसे विषय-विकारों की ओर अधिक आकर्षण बढ़ता है । आकर्षण राग उत्पन्न करता है तथा राग प्रयत्न करने को प्रेरित करता है ।
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प्रयत्न ही कर्म हैं जो बंधन के हेतु हैं । (यहाँ आत्मसाक्षात्कार से रहित तथा वेदविहित तत्त्वज्ञान के परिपक्व विवेक से हीन गुरु, उपदेशक को ही वैद्य कहा गया है) वस्तुतः ऐसे अज्ञानी वैद्य रूपी गुरु-उपदेशक जोराँ = यम के दूतों के समान हैं जो समस्त संसार के प्राणियों को मार-मार कर यमराज के यहाँ भेजते हैं, यमराज के यहाँ जाने का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं ।
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ये उपदेशक निर्गुण-निराकार-परमात्मा की भक्ति रूपी कडुवे नीम को तो खिलाते-पिलाते नहीं हैं उल्टे जिस सगुण-साकार-परमात्मा की भक्ति करने से विषयभोगों में आसक्ति होती है, उस सगुणभक्ति को हृदय में धारण करवाते हैं । सारा संसार ही इसी औषधि = सगुण साकार की भक्ति में सवायौ = पूर्णरूपेण लगा हुआ है जिसके कारण सारा संसार ही अपुत्र की भाँति मरता है । (जिस प्रकार पिता के अपुत्र मरने से गति नहीं होती ऐसे ही सगुण की भक्ति करने से मुक्ति नहीं होती । “सगुणोपासक मोछ न लेही” । यहाँ अज्ञानी वैद्य के उपदेश से अपुत्र मरने का तात्पर्य यही है)
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निर्गुण-निराकार परमात्मा का नाम स्मरण रूपी भक्ति कडुवे नीम के समान है जिसके सेवन से किसी भी प्रकार की कोई भी बिमारी नहीं होती उल्टे व्यक्ति स्वस्थ रहता है । ऐसे ही निर्गुण-निराकार की भक्ति से कर्मों का बंधन कट जाता है तथा मुमुक्षु थीवाइ = मुक्त हो जाता है । वस्तुतः संसारी उपदेशक सम्यक् विचार नहीं करते । वे भक्ति के नाम पर विषयभोगों में वैसे ही आसक्ति उत्पन्न करा देता हैं जैसे कोई वैद्य अज्ञानवश घी में शहद मिलाकर रोगी को खिला देता है और(समान मात्रा में घी-शहद का योग विष बन जाता है । यहाँ नरकगामी होना ही विष बन जाना है ।) जिससे रोगी की मृत्यु हो जाती है ॥५७॥
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“निरगुण सरगुण भगति उभै मधि अंतर जाणूँ ।
सरगुण रूप बिणास अकल निरगुण नित माणूँ ।
सरगुण गाय सिंगार धार बिषिया मन झूलै ।
निरगुण नाँइ अधार भोग राजस गुण भूलै ।
सरगुण सोभा जगत मैं उरै रहै उरझाइ ।
रामचरण महिमा सहित निरगुण निज धर जाइ ॥२॥
ब्रिंदावन मैं बास दास केसौ ज बिचारी ।
अपणुँ सुत परमोधि ग्यान कौ करि अधिकारी ।
ग्रिह कौ धरम निहारि बहुरि पीछै पिछतायौ ।
विषै कै काजि किसन कूँ कामी गायौ ।
बिप्र भयौ सो भूत लाभ सरगुण कौ देखौ ।
निरगुण गाइ कबीर मुकति गयौ जवन बिसेषौ ।
नहीं भेद भगवान कै यौं मुकरि मधि उणिहार ।
ज्यौं देषै ज्यूँ दरसि हैं टेढौ सुध सिणगार ॥३॥
(क्रमशः)

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