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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग १३/१६
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सुन्दर पर्बत उडि गये, रुई रही थिर होइ ।
बाव बह्यौ इंहिं भांति कौ, क्यौं करि मांनै कोइ ॥१३॥
ज्ञान की पवन का ऐसा झोंका आया कि साधक के पर्वत के समान अहंकार आदि उड़ गये; परन्तु निर्मल, स्वच्छ एवं गुरुतारहित सात्त्विक वृत्ति उसके अन्तःकरण में दृढता से जम कर बैठ गयी । इस बात का यथार्थ कोई विचारवान् पुरुष ही जान सकता है, कोई अज्ञ इसे क्या समझेगा ॥१३॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १० उत्तरार्ध) ॥
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ल्याळी खायौ गाडरै, सुसले खायौ स्वांन ।
सुन्दर यह कैसी भई, बधक हि लागौ बांन ॥१४॥
भेड़ (साधक की सात्त्विकी वृत्ति के अभ्यास ने भेडिया(ल्याळी) रूप मनोविकारों को खा डाला । तथा इस प्रकार शील-संतोष रूप खरगोश(सुसलै) ने क्रोध, क्रूरता एवं संतों को देख कर भोंकना आदि कुत्ते की चेष्टा रूप दुष्ट वृत्तियों का पूर्णतः निवारण कर दिया । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यहाँ यह कैसी विपरीत बात हुई की वाण मारनेवाला ही अपने वाण से मारा गया ! ॥१४॥ (सवैया ग्रन्थ में इस साषी का व्याख्यान नहीं है)॥
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ब्रह्मा ऊपर हंस चढि, कियौ गगन दिशि गौन ।
गरुड चढ्यौ हरि पीठि पर, सुन्दर मांनै कौंन ॥१५॥
हंस(जीव) ब्रह्मा(रजोगुण) से सम्पृक्त रहता है तो संसार में जन्ममरण परम्परा से आता जाता रहता है; परन्तु वह जीव जब गरुड(ज्ञान) पर आरूढ हो जाता है तो उसका सत्त्वगुणमय ईश्वर से मेल हो जाता है ॥१५॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० ८) ॥
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वृषभ भयौ असवार पुनि, सुन्दर शिव पर आइ ।
डाइन ऊपर जरख चढि, भली दई दौराइ ॥१६॥
जब हमारा वृषभ(बैल रूप शरीर) शिव(तमोगुण) पर आरूढ हो जाता है, या लौकिक पदार्थों की अतिशय वासना रूप डायन जरख(भेड़िया=संकल्प विकल्पात्मक मन) पर चढ जाती है तो उसे संसार में इधर उधर दौड़ाती रहती है ॥१६॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० सं० ८) ॥
(क्रमशः)

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