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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ४९/५२*
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संतनि की सेवा किये, हरि की सेवा होइ ।
तातें सुन्दर एक ही, मति करि जानै दोइ ॥४९॥
शास्त्रों में भी यहीं कहा है कि सन्तों की सेवा करने से वह भगवान् की सेवा ही मानी जाती है । अतः श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वे दोनों(हरि एवं हरिभक्त) एक ही हैं, उन दोनों को दो(भिन्न भिन्न) समझने की भूल(प्रमाद) न करना ॥४९॥
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संतनि की सेवा किये, सुन्दर रीझै आप ।
जाकौ पुत्र लडाइये, अति सुख पावै बाप ॥५०॥
"सन्तों की सेवा से भगवान् प्रसन्न होते हैं' - इस बात को एक सरल उदाहरण देकर समझा रहे हैं – समाज में हम देखते हैं कि हम किसी के पुत्र से जब प्रेमव्यवहार करते हैं तो उसे देख कर उस का पिता भी अतिशय प्रसन्न होता है । (भक्त भी भगवान् के पुत्र तुल्य ही माने जाते हैं) ॥५०॥
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संतनि कौं कोउ दुःख दे, तब हरि करै सहाइ ।
सुन्दर रांभै बाछरा, सुनि करि दौरै गाइ ॥५१॥
यदि कोई दुष्ट सन्तों को कष्ट देता है तो भगवान् सन्तों के कष्ट को दूर करने के लिये तत्काल वहाँ पहुँचते हैं । जैसे कोई गौ अपने बछड़े की पुकार सुनकर तत्काल उसके पास पहुँच जाती है ॥५१॥
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अठसठ तीरथ जौ फिरै, कोटि यज्ञ ब्रत दांन ।
सुन्दर दरसन साधु कै, तुलै नहीं कछु आंन ॥५२॥
(अब भी श्रीसुन्दरदासजी एक अन्य उदाहरण द्वारा सन्त सेवा का महत्त्व स्थापित कर रहे हैं -) काशी, मथुरा, द्वारका, हरद्वार आदि अडसठ(६८) तीर्थों में जाकर स्नान करना, करोड़ों यज्ञ, दान, व्रत आदि करना - ये सब शुभ कर्म मिल कर भी सन्तदर्शन से तुलना(समानता) नहीं कर सकते ॥५२॥
(क्रमशः)

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