सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

*ब्रह्म-विचार ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कहा कहूँ कुछ वरणि न जाई,*
*अविगति अंतर ज्योति जगाई ।*
*दादू उनको मरम न जानै,*
*आप सुरंगे बैन बजाई ॥*
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*ब्रह्म-विचार ॥*
वारी रे अणघड़िया देवा । तेरी पूजा तेरी सेवा ॥टेक॥ 
वारी रे अणघड़िया देवा, मोहि भरोसा१ पड़िया । 
सब संसार सँवार्या तेरा, तूँ क्याँह सेती घड़िया ॥
आपै आप अलख्य निरंजन, सूरति मूरति सारा ।
कानौं सुन्या न आँख्यौं देख्या, तेरा घड़िनैंहारा ॥
दस औतार कहैं औतरिया, सो तौ राम न होई ।
उन्हौं कमाई अपणी पाई, करता औरे कोई ॥
काकौ पूत पीता को वाकौ, कहौ कौंण सौं लड़िया ।
कह बषनां एक राम कहंताँ, कोई झूठि न पड़िया ॥५१॥ 
(१ पाठांतर : ‘वरांसा’ (संशय) व मंगलदासजी की पुस्तक में । वि. सं. १७८० व १७८५की पुस्तकों में पाठ ‘भरोसा’ ही है ।) 
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हे अणघड़िया(जिसे किसी ने न बनाया हो, जिसका कारण कोई अन्य न होकर स्वयं ही हो) देव ! मैं तुझ पर न्यौछावर होता हूँ । मैं तेरी ही पूजा और तेरी ही सेवा करता हूँ । मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि तू अणघड़िया देव ही है और इसीलिये मैं तेरे ऊपर न्यौछावर होता हूँ । 
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सारा संसार तेरे द्वारा ही निर्मित है अर्थात् तू ही समस्त ब्रह्माण्ड का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है किन्तु हे देव ! अज्ञ लोगों की शंका निवृत्यर्य मुझे यह तो बता दे कि तू किसके द्वारा बनाया गया है अर्थात् तेरा कर्त्ता कौन है 
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(दर्शनशास्त्र में अनवस्था नामक एक दोष का वर्णन उस समय आता है जब हम ब्रह्म की मीमांसा करते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि एक कार्य का कोई कारण, उसका कोई दूसरा कारण, उसका कोई तीसरा कारण, इस प्रकार कारणों की श्रंखला चल पड़ती है और उसका अंत नहीं होता । कारण का कारण बताते-बताते अव्यवस्था फैल जाती है, किसी एक अवस्था का निर्धारण नहीं हो पाता, यही अनवस्था दोष है । अतः मीमांसाकारों ने परमात्मा का कोई कारण नहीं, यही निर्धारित किया है क्योंकि किसी न किसी स्थिति पर पहुँच कर तो अन्तिम कर्त्ता यही है, कहना पड़ता है ।) 
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हे परमात्मन् ! तू ही तेरा कारण और तू ही तेरा कार्य हैं (आपै-आप), अलख और माया से रहित निरंजन है । संसार के जर्रे-जर्रे में तेरी ही सूरत-मूरत निवास करती है । इसीलिये तेरे को बनाने वाले के बारे में न तो कानों से सुनने में ही आया है और न उसे किसी ने आजतक आँखों से देखा ही है । 
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कुछ लोग कहते हैं, तू दस बार इस पृथिवी पर अवतरित हुआ है किन्तु मेरी मान्यता के अनुसार तो तू अणघड़िया देव उन दस अवतारों के रूप में अवतरित हुआ ही नहीं । क्योंकि उन्होंने जो भो अतिमानवीय कार्य किये उनका फल उन्हें मिल गया तथा उनको बनाने वाला वे स्वयं न होकर कोई और ही है । 
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बताइये, अणघड़िया देव किसका पुत्र है तथा उसका पिता कौन है, साथ ही यह भी बताइये कि वह किस-किस से लड़ा । अर्थात् अणघड़िया देव का कोई पिता नहीं है तथा उसका कोई पुत्र भी नहीं है । वह शरीरधारी न होने से किसी से प्रत्यक्ष रूप में लड़ा भी नहीं है । बषनां कहता है नाना राम कहने के स्थान पर राम को एक अद्वितीय कहने पर कोई भी झूठे नहीं पड़ते, झूठ = भ्रम में नहीं पड़ते ॥५१॥
(क्रमशः) 

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