मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

मेरा परित्राण करो

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जे नर कामिनी परहरैं, ते छूटैं गर्भवास ।*
*दादू ऊँधे मुख नहीं, रहैं निरंजन पास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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नरेन्द्र - निर्लिप्त संसार कहिये या चाहे जो कहिये, काम-कांचन का त्याग बिना किये न होगा । स्त्री के साथ सहवास करते हुए घृणा नहीं होती ? जहाँ कृमि, कफ, मेध, दुर्गन्ध –
"अमेध्यपूर्णे कृमिजालसंकुले स्वभावदुर्गन्धिविनिन्दितान्तरे ।
कलेवरे मूत्रपूरीषभाविते रमन्ति मूढ़ा विरमन्ति पण्डिताः ॥
"वेदान्त-वाक्यों में जो रमण नहीं करता, हरिरस का जो पान नहीं करता, उसका जीवन ही वृथा है ।
"ओंकारमूलं परमं पदान्तरं गायत्रीसावित्रीसुभाषितान्तरम् ।
वेदान्तरं यः पुरुषो न सेवते वृथान्तरं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
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"एक गाना सुनिये - (भावार्थ)
"मोह और कुमन्त्रणा को छोड़ो, उन्हें जानो, तब सम्पूर्ण कष्ट छूट जायेंगे । चार दिन के सुख के लिए अपने जीवन-सखा को भूल गये, यह कैसा ?
"कौपीन धारण बिना किये दूसरा उपाय नहीं - संसारत्याग !" - यह कहकर नरेन्द्र सस्वर गाने लगे –
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"वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो भिक्षान्नमात्रेण च तुष्टिमन्तः ।
अशोकमन्तःकरणे चरन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥"
नरेन्द्र फिर कह रहे हैं - "मनुष्य संसार में बँधा क्यों रहेगा ? क्यों वह माया में पड़े ? मनुष्य का स्वरूप क्या है ? 'चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ।' मैं ही वह सच्चिदानन्द हूँ ।"
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फिर स्वरसहित नरेन्द्र शंकराचार्य-कृत स्तव पढ़ने लगे –
ॐ मनो बुद्धयहंकारचित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
एक दूसरा स्तव वासुदेवाष्टक भी नरेन्द्र सस्वर पढ़ रहे हैं । "हे मधुसूदन ! मैं तुम्हारे शरणागत हूँ, मुझ पर कृपा करके काम, निद्रा, पाप, मोह, स्त्री-पुत्र का मोहजाल, विषय-तृष्णा, इन सब से मेरा परित्राण करो और अपने पाद-पद्मों में भक्ति दो ।"
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"ॐ इति ज्ञानरूपेण रागाजीर्णेन जीर्यतः।
कामनिद्रां प्रपन्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
न गतिर्विद्यते नाथ त्वमेकः शरणं प्रभो ।
पापपंके निमग्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
मोहितो मोहजालेन पुत्रदारगृहादिषु ।
तृष्णया पीड्यमानोऽहं त्राहि मां मधुसूदन ॥
भक्तिहीनं च दीनं च दुःखशोकातुरं प्रभो ।
अनाश्रयमनाथं च त्राहि मां मधुसूदन ॥
गतागतेन श्रान्तोऽहं दीर्घसंसारवर्त्मसु ।
येन भूयो न गच्छामि त्राहि मां मधुसूदन ॥
बहुधाऽपि मया दृष्टं योनिद्वारं पृथक् पृथक् ।
गर्भवासे महद्दुःखं त्राहि मां मधुसूदन ॥
तेन देव प्रपन्नोऽस्मि नारायणपरायणः ।
जगत्संसारमोक्षार्थ त्राहि मां मधुसूदन ॥
वाचयामि यथोत्पन्नं प्रणमामि तवाग्रतः ।
जरामरणभीतोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
सुकृतं न कृतं किंचित् दुष्कृतं च कृतं मया ।
संसारे पापपंकेऽस्मिन् त्राहि मां मधुसूदन ॥
देहान्तरसहस्राणामन्योन्यं च कृतं मया ।
कर्तृत्वं च मनुष्याणां त्राहि मां मधुसूदन ॥
वाक्येन यत्प्रतिज्ञातं कर्मणा नोपपादितम् ।
सोऽहं देव दुराचारस्त्राहि मां मधुसूदन ॥
यत्र यत्र हि जातोऽस्मि स्त्रीषु वा पुरुषेषु वा ।
तत्र तत्राचला भक्तिस्त्राहि मां मधुसूदन ॥"
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मास्टर - (स्वगत) - नरेन्द्र को तीव्र वैराग्य है । इसलिए मठ के अन्य भाइयों की भी यही अवस्था है । इन लोगों को देखते ही श्रीरामकृष्ण के उन भक्तों में, जो संसार में अब भी हैं कामिनीकांचन-त्याग की इच्छा प्रबल हो जाती है । अहा ! इनकी यह कैसी अवस्था है ! दूसरे कुछ भक्तों को उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) अब भी संसार में क्यों रखा है ? क्या वे कोई उपाय करेंगे ? क्या वे तीव्र वैराग्य देंगे या संसार में ही भुलाकर रख छोड़ेंगे ?
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नरेन्द्र तथा और दो-एक अन्य भाई भोजन करके कलकत्ता गये । नरेन्द्र रात को फिर लौटेंगे । नरेन्द्र के घरसम्बन्धी मुकदमे का अब भी फैसला नहीं हुआ । मठ के भाइयों को नरेन्द्र की अनुपस्थिति सह्य नहीं होती । सब सोच रहे हैं कि नरेन्द्र कब लौटें ।
(क्रमशः)

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