मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१३७/१४०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१३७/१४०*
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*सद्गुरु वर्षे मेघ ज्यों, रज्जब ॠतु शिर आय ।*
*शिष वसुधा व्है लेय जल, ऊगे अगम अघाय१ ॥१३७॥*
वर्षा ॠतु में बादल वर्षते हैं, उस जल को पृथ्वी लेती है तब उसमें अनन्त बीज उगते हैं और उनसे हरियाली होकर पृथ्वी की शोभा बढ़ती है । वैसे ही, सद्गुरु जिज्ञासा होने पर शिष्यों को ज्ञान प्रदान करते हैं, शिष्य उसे ग्रहण करते हैं तब तृप्त१ हो जाते हैं ।
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*रज्जब रवे सु सार के, चम्बुक लगे सु धाय ।*
*त्यों अंकूरी आतमा, सद्गुरु मिले सु आय ॥१३८॥*
जैसे चम्बुक को पृथ्वी की रेत में हिलाने से रेत में स्थित लोहे के दाने दौड़कर चम्बुक के आ लगते हैं । वैसे ही जिसमें परमार्थ का अँकुर है वह जीवात्मा सद्गुरु से आ मिलता है ।
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*चेला तब ही जानिये, चित्त रहै चितलाय ।* 
*रज्जब दूजा देखिये, जब लग आवे जाय ॥१३९॥* 
१३९-१४२ में शिष्य की पहचान बता रहे हैं - जब तक विषयों में चित का गमनागमन होता है तब तक शिष्य न कहला कर शिष्य से अन्य संसारी ही कहलायेगा । शिष्य तभी जानना चाहिये, जब वह अपने चित्त को चेतन में ही लगाये रहे ।
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*शिष्य सही सोई भया, रहै सीख में जोय ।* 
*रज्जब श्रद्धा सीख सौं, दूजा कदे न होय ॥१४०॥* 
सच्चा शिष्य वही कहलाता है, जो गुरु की शिक्षा में रहता है । श्रद्धा सहित गुरु की शिक्षा मानने वाले शिष्य में द्वैत भाव कभी भी उत्पन्न नहीं होता । 
(क्रमशः)

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