शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

१७ आचार्य रामलालजी

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १४  
१७ आचार्य रामलालजी ~
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रामलालजी शरीर से शार्दूलपुरा के गूजर गौड़ ब्राह्मण थे । आचार्य दयारामजी महाराज के शिष्य बचपन में ही हो गये थे और गुरु सेवा में तत्पर रहते थे । बडे हो जाने पर कार्य कुशल भी हो गये थे । फिर मुख्य भंडारी भी बन गये थे । गुरु सेवा और कुशलता आदि से ये आचार्य दयारामजी महाराज के विशेष रुप से कृपा पात्र भी बन गये थे । 
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इससे आचार्य दयारामजी महाराज ने इसको अपना उत्तराधिकारी नियत करने से विरोध भी खडा हो गया था । परन्तु अन्त में आचार्य दयारामजी महाराज ब्रह्मलीन होने पर समाज ने सोच विचार करके  वि. स. १९८८ कार्तिक शुक्ल ११ को आचार्य पद पर रामलालजी को ही बैठाया । कारण दादूद्वारे का सर्वस्व रामलालजी के ही हाथ में था । 
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रामलालजी ही सब रहस्यों के तथा मर्यादाओं के जानकार थे । तथा स्थान का संरक्षक अन्य कोई इनके समान उस समय था भी नहीं । अन्य को बैठाने में लाभ के स्थान में हानि की संभावना थी । इत्यादिक  सब बातें सोचकर रामलालजी को ही आचार्य पद पर अभिषिक्त किया गया । 
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चरण प्रतिष्ठा ~ 
आचार्य रामलालजी महाराज ने अपने गुरुदेव पूर्वाचार्य दयारामजी महाराज के चरण प्रतिष्ठा के लिये संगमरमर की विशाल छत्री बनवाई और वि. सं. १९८८ फाल्गुण शुक्ल पक्ष में मेले के समय बडा मेला भरवाकर चरण प्रतिष्ठा करवाई । मेले में आगत सर्व समाज को भोजन कराया और दादूपंथ को पूजा बांटी । उक्त कार्य अति कुशलता से किया गया । 
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सद्व्यवहार ~  
पूर्व में जो विरोध था, वह आचार्य रामलालजी के सद्व्यवहार से समाप्त हो गया । आपने दादूद्वारे के धार्मिक  कार्य सदाव्रत आदि जो सदा से चले आ रहे थे, उन सबको सुचारु रुप से चलाये । आपका अपने इष्ट में दॄढ विश्‍वास था । आपका दिन रात्रि का अधिक समय ब्रह्म भजन में ही व्यतीत होता था । आप प्रत्येक सम्प्रदाय और धार्मिक समाजों को अच्छी दृष्टि से देखते थे । आपके उपदेश में मूल दो बातें थीं - दयाल पर विश्‍वास रक्खो और अपने धर्म में अडिग रहो । आपके निश्‍चय के समान ही आपको सफलता भी मिलती थी ।
(क्रमशः) 

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