शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

*ज्ञान-विचार ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू देखु दयालु को, रोक रह्या सब ठौर ।*
*घट घट मेरा सांइयाँ, तूँ जनि जानै और ॥*
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*ज्ञान-विचार ॥*
अैसी काहे न बूझै काजी ।
जे तैं एक एक करि जाण्याँ, तौ दूसरि दगाबाजी ॥टेक॥
एकै खाना एकहि माटी, एकहि घडनैंहारा ।
एक चाक परि सबै उतार्या, सारा सकल पसारा ॥
एकहि कूवा एकहि पाणी, जिनि भरि आण्याँ जिसका ।
भरियाँ पछैं अपूठा न्यौड़हिं, तब वो पाणी किसका ॥
जैसी कीड़ी तैसा हाथी, जीव सबै सारीखा ।
जाणैं कौंण जौहरी पाखै, हीरे की पारिखा ॥
पाणी अरु पाखाण माँहि तू, जल थल मैं अँस तेरा ।
बषनौं कहै न देखूँ दूज, सारै साहिब मेरा ॥६३॥
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बूझै = पूछता है; जानता है  बूझना पूछने, जानने, समझने आदि के अर्थ में प्रयुक्त होता है । बषनांजी काजी  = इस्लामधर्म के मर्मज्ञ उपदेशक से प्रश्न करते हुए कहते हैं; हे काजी ! यदि तूने एक = अद्वितीय परमात्मा को अद्वितीय रूप में ही जानकर तदतिरिक्त सभी को दगाबाजी = धोखा = मिथ्या = भ्रमजाल जान लिया है तो फिर क्यों नहीं इस ज्ञान को आचरण में उतारता है तथा क्यों नहीं अपने श्रोताओं को सुनाकर उनसे आचरित करवाता है । 
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कारण, हिन्दू, मुसलमान आदि सभी एक ही प्रकृति रूपी खान के माटी रूपी पंच तत्वों से निर्मित शरीरवाले हैं और इनका कर्त्ता = घड़ने वाला = निमित्त कारण एक अद्वितीय परब्रह्म-परमात्मा ही है । जिस प्रकार घड़ा बनाने वाला कुम्हार सभी घड़ों को एक ही चाक पर बनाता है तथापि उस एक की ही कृति होने पर भी वे भिन्न-भिन्न से लगते हैं जबकि उनका उपादान कारण मिट्टी तथा निमित्तकारण कुम्हार एक ही होता है । वैसे ही सारे सचराचर ब्रह्मांड को उस परमात्मा ने अपनी प्रकृतिरूपी चाक पर ही बनाया है जिससे सारा ब्रह्मांड उस एक की ही रचना है~
“मम योनिर्महद्ब्रह्म तसमिन्गर्भं दधाम्यहम् । 
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥” १४/३ ॥ 
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जिस प्रकार एक कूवे में एक ही पानी होता है किन्तु जैसे ही पानी घड़े में भरकर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा लाया जाकर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों का कहलाने लगता है वैसे ही सभी शरीरों में एक ही परमात्मा विद्यमान है किन्तु पूर्वजन्मकृत भिन्न-भिन्न कर्मों के कारण एक ही चैतन्य की भिन्न-भिन्न संज्ञा हो जाती है किन्तु जब भरे हुए जल को वापिस कूवे में डाल दिया जाता है तब वह पानी किसी का भी न रहकर एक हो जाता है । 
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ऐसे ही शरीर रूपी उपाधि के समाप्त चैतन्य तो स्वजातीय, विजातीय तथा स्वगत तीनों भेदों से शून्य है । आत्मा सभी में समान है चाहे वह विशालाकाय हाथी हो चाहे लघुकाय चींटी हो । वस्तुतः हीरे की परख जौहरी के अलावा कौन जान सकता है । ऐसे ही एक आत्मा सभी शरीरों में आत्मज्ञानी के अलावा कौन अनुभव कर सकता है । 
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बषनांजी अपने इष्ट से कहते हैं, हे परमात्मन् ! तू ही पानी और पाषाण में समाया हुआ है तथा तू ही जल-थल में परिव्याप्त है; जल थल तेरे ही अंश हैं । समस्त सचराचर में हे मेरे साहिब ! तू ही है । अतः मैं तो समस्त सचराचर में तेरे अतिरिक्त अन्य किसी को देखता नहीं हूँ ॥ 
“मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । 
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥९/४॥” 
“सीयाराम मय सब जग जानी । 
करहूँ प्रनाम जोरि जुग पानी ।” 
“हरि व्यापक सर्वत्र समाना । 
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥”

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