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🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू उज्जवल निर्मला,*
*हरि रंग राता होइ ।*
*काहे दादू पचि मरै, पानी सेती धोइ ॥ *
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*बाह्याचरण ॥ साषी लापचारी की ॥*
अडसठि पाणियाँ धोइये, अठसठि तीरथ न्हाइ ।
कहु बषनां मन मच्छ की, अजौं कौलांधि न जाइ ॥१
(इसका अर्थ “मन कौ अंग” की साषी क्रमांक १५ में देखें ।)
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पद
भाइ रे क्या न्हाया क्या धोया ।
तीरथाँ तीरथाँ भ्रमताँ भ्रमताँ, तिल भी मैल न खोया ॥टेक॥
करिकरि पाप प्रित्थमी सगली, पाणी माँहै न्हावै ।
माहिकी का माछर की नाँई, लार अपूठौ आवै ॥
गंगा नैं गोदावरि न्हाया, पुहकर तीराँ पैली ।
आँखि उघाड़ि देखै क्यूँ नांहीं, ऊजल हुई कि मैली ॥
जण जण कै गलि बांध्यौ दीसै, ठाकुर बटुवा माँहीं ।
इहिं न छोड़ि पुहकर वाला कै, तूँ चाल्यौ काँह कै ताँई ॥
क्युँहुँ ग्यान बिचार साध की संगति, सेवौ हरि अविनासी ।
बषनां पाप बड़ा ल्होडाँ कौ, राम भजन तें जासी ॥५४॥
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तीर्थ दर तीर्थ धूम-धूमकर खूब स्नान किया, फिर भी मैल = पापों का किञ्चित मात्र भी नाश न हुआ । अतः हे भाई ! जरा चित्त में विचार करके तो देख कि तूने तीर्थों में क्या तो धोया और वहाँ नहाने से तुझे क्या-क्या लाभ हुए । अथवा तीर्थ दर तीर्थ घूमते रहने पर यदि लेशमात्र भी पापों का नाश नहीं हुआ तो नहाने तथा धोने का क्या तात्पर्य ?
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वस्तुतः पृथिवी के समस्त मनुष्य अनेकों पाप करके तीर्थों के पानी में नहाते हैं किन्तु तीर्थों में नहाना ठीक वैसे ही व्यर्थ है जैसे भैंस के पानी में नहाने के उपरान्त भी उसके ऊपर भिनकने वाली मक्खियाँ एक भी न हटकर साथ की साथ वापिस आ जाती है; मनुष्य के तीर्थों में नहा लेने पर भी पाप मनुष्य के साथ ही वापिस आ जाते हैं क्योंकि तीर्थों में नहाने से पापों की निवृत्ति नहीं होती ।
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मनुष्य गंगा और गोदावरी में नहाता है । तीर्थराज पुष्कर के सरोवर में एक तीर से दूसरे तीर तक जाकर स्नान करते हैं किन्तु आँख उघाड़ि = स्वतंत्रतापूर्वक विचार करके नहीं देखते कि वास्तव में तीर्थों में स्नान करने से पापों की निवृत्ति होकर अंतःकरण शुद्ध हुआ अथवा मिला हुआ ।
वस्तुतः तीर्थस्थान के उपरान्त भी यदि मनुष्य अपनी दुष्प्रवृत्तियाँ नहीं छोड़ता तो वे पाप अत्यन्त भयंकर हो जाते हैं और बिना भगवन्नाम के अन्य उपायों से छूटते नहीं है ।
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जने-जने के गले में ही ठाकुर का बटवा = कोथली बंधी हुई रहती है अर्थात् जब ठाकुरजी स्वयं के पास ही उपलब्ध है तब गले के भगवान को छोड़कर = भूलकर पुष्कर स्थित ब्रह्मा = भगवान् का दर्शन करने जाने का क्या तात्पर्य ? तू किसलिये दर्शन करने जाता है । कुछ तो ज्ञान का विचार साधुओं की संगति में प्राप्त करके अविनाशी हरि की सेवा = भजन ध्यान करना चाहिये ? क्योंकि छोटे तथा बड़े सभी प्रकार के पाप तीर्थाटन, तीर्थ स्नान से न कटकर रामभजन से ही कटेंगे ॥५४॥
(क्रमशः)

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